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कंगना रनोत हिमाचल लौट गई हैं, मगर शिवसेना पर उनके हमले बंद नहीं हो रहे। उधर, 4 हजार लोगों के कोरोना टेस्ट के बाद संसद का मानसून सत्र शुरू हो चुका है। चलिए, शुरू करते हैं मॉर्निंग न्यूज ब्रीफ।
आज इन 2 इवेंट्स पर रहेगी नजर
1. प्रधानमंत्री मोदी बिहार के लिए 541 करोड़ रुपए के 7 प्रोजेक्ट्स का शिलान्यास करेंगे।
2. रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह संसद में एलएसी पर जारी भारत-चीन मामले पर बयान दे सकते हैं।
अब कल की 7 महत्वपूर्ण खबरें
1. मानसून सत्र का पहला दिन, 17 सांसद पॉजिटिव मिले
सोमवार से 17वीं लोकसभा का चौथा सत्र शुरू हुआ। जदयू सांसद हरिवंश राज्यसभा के उप-सभापति चुने गए। संसद के एंट्री पॉइंट पर टेम्परेचर चेक किया गया। अब तक 17 सांसदों की रिपोर्ट पॉजिटिव आई है। इनमें 12 सांसद भाजपा के हैं। -पढ़ें पूरी खबर
2. कंगना हिमाचल लौटीं, आदित्य पर साधा निशाना
5 दिन मुंबई में बिताने के बाद कंगना हिमाचल लौट गईं। वहां पहुंचते ही ट्वीट किया, “महाराष्ट्र के सीएम की समस्या यह है कि मैंने सुशांत सिंह राजपूत के हत्यारों का पर्दाफाश किया, जो उनके प्यारे बेटे आदित्य ठाकरे के साथ घूमते हैं। अब वे मुझे फिक्स करना चाहते हैं, देखते हैं कि कौन किसे फिक्स करता है।” -पढ़ें पूरी खबर
3. भारत के बड़े लोगों पर चीन की जासूसी नजर
चीनी सरकार से जुड़ी एक बड़ी डेटा कंपनी 10 हजार भारतीय लोगों और संगठनों की निगरानी कर रही है। इनमें प्रधानमंत्री मोदी, राष्ट्रपति कोविंद और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया समेत 10 हजार बड़े लोगों और संस्थाओं का नाम शामिल है। इंडियन एक्सप्रेस की इन्वेस्टिगेशन में ये खुलासा हुआ है। -पढ़ें पूरी खबर
4. चॉकलेट सोल्जर
चीनी सैनिक चॉकलेट सोल्जर हैं। यह शब्द जॉर्ज बर्नार्ड शॉ के नाटक ‘आर्म्स एंड द मैन’ से लिया गया है। जो लोग सेना में पैसों और फायदे के लिए भर्ती होते हैं और गोली का सामना करने से डरते हैं, उन्हें चॉकलेट सोल्जर कहा जाता है। चीन के बारे में ऐसा इसलिए कहा जा रहा है क्योंकि पिछले दिनों जब भारत ने लद्दाख की अहम चोटियों पर कब्जा किया, तब एक चीनी अफसर ने काउंटर अटैक करने से इनकार कर दिया। -पढ़ें पूरी खबर
5. भारत-चीन सीमा से शौर्य की सबसे मजबूत कहानी
कर्नल रणबीर सिंह जमवाल तीन बार एवरेस्ट फतह कर चुके हैं। उन्होंने ही भारतीय सैनिकों को 18 हजार फीट की ऊंचाई पर कम ऑक्सीजन और माइनस तापमान के बीच ब्लैक टॉप तक पहुंचाया। वे देश में इकलौते हैं, जो दुनिया की सात सबसे ऊंची चोटियों को छूकर लौटे हैं। -पढ़ें पूरी खबर
6. टिकटॉक को खरीदने में ओरेकल ने बाजी मारी
चीनी कंपनी बाइटडांस के शॉर्ट वीडियो प्लेटफॉर्म टिकटॉक के अमेरिकी कारोबार को खरीदने में ओरेकल ने बाजी मारी। हालांकि, बाइटडांस ने इस साझेदारी का खंडन किया। वहीं, न्यूयॉर्क टाइम्स के मुताबिक, बाइटडांस ने टिकटॉक को चलाने के लिए ओरेकल को बतौर टेक्नीकल पार्टनर चुना है। -पढ़ें पूरी खबर
7. अगले महीने से सिनेमा हॉल खोलने की तैयारी
अनलॉक 4.0 की गाइडलाइंस 30 सितंबर को खत्म हो रही है। ऐसी उम्मीद है कि 1 अक्टूबर से नई गाइडलाइंस में सिनेमा हॉल खोलने की अनुमति मिल जाए। पूरे देश में मूवी थिएटर 23 मार्च से बंद हैं। मल्टीप्लेक्स में भी कोरोनावायरस से सेफ्टी को लेकर विशेष इंतजाम किए जा रहे हैं। -पढ़ें पूरी खबर
अब 15 सितंबर का इतिहास
1860: भारत के सबसे बड़े इंजीनियर माने जाने वाले एम. विश्वेश्वरैया का जन्म हुआ। इसे देश में इंजीनियर्स डे के तौर पर मनाया जाता है।
1876: शरतचंद्र चट्टोपाध्याय का जन्म हुआ।
1959: दिल्ली में दूरदर्शन की शुरुआत हुई।
2008: अमेरिका के सबसे बड़े बैंकों में से एक लीमैन ब्रदर्स ने खुद को दिवालिया घोषित किया। यह वैश्विक मंदी के कारकों में से एक था।
जाते-जाते बात बांग्ला के सुप्रसिद्ध उपन्यासकार एवं लघुकथाकार शरतचन्द्र चट्टोपाध्याय की। आज ही के दिन उनका जन्म हुआ था।
कोरोनावायरस के कारण आईपीएल का 13वां सीजन इस बार यूएई में 19 सितंबर से शुरू होने जा रहा है। फाइनल 10 नवंबर को होगा। सभी 8 टीमों के बीच 53 दिन में फाइनल समेत 60 मुकाबले होंगे। अब तक हुए 12 सीजन में मुंबई इंडियंस ने सबसे ज्यादा चार बार 2013, 2015, 2017 और 2019 में आईपीएल जीता। दूसरे नंबर पर चेन्नई सुपर किंग्स है। यह टीम 2010, 2011 और 2018 में आईपीएल की चैम्पियन बनी। यानी कुल तीन बार।
फाइनल खेलने के मामले में चेन्नई सबसे आगे है, जो 12 में से 8 सीजन में फाइनल तक पहुंच चुकी है। वहीं, लीग के इतिहास में सबसे ज्यादा रन रॉयल चैलेंजर्स बेंगलुरु के कप्तान विराट कोहली के हैं। उन्होंने 177 मैच में 5412 रन बनाए हैं।
इस खबर में हम आपको बता रहे हैं सबसे ज्यादा रन, सबसे ज्यादा विकेट, सबसे ज्यादा डॉट बॉल, सबसे ज्यादा शतक जैसे आईपीएल के 11 रिकॉर्ड्स...
दिल्ली के किदवई नगर इलाके के पूर्वी छोर से एक बड़ा नाला गुजरता है। इसे कुशक नाला भी कहते हैं। 28 साल के अरुण इसी नाले के किनारे बसी एक झुग्गी बस्ती में पैदा हुए थे। अरुण जब छोटे थे तो इस इलाके में उनकी झुग्गी के इर्द-गिर्द ज़्यादा कुछ नहीं था।
यहां बना आयुष भवन हो, केंद्रीय सतर्कता आयोग का ऑफ़िस हो या एनबीसीसी की बहुमंजिला इमारतें, सब उनके देखते-देखते ही बने। बारापुला फ्लाइओवर को बने तो अभी कुछ ही साल हुए हैं जो उनकी झुग्गी बस्ती के ठीक ऊपर किसी सीमेंट के इंद्रधनुष की तरह उग आया है।
अरुण जैसे-जैसे बड़े हुए, उनके आस-पास का हरा-भरा इलाका कंक्रीट के जंगल में बदलता गया और उनकी झुग्गी बस्ती लगातार इसके बीच सिमटती चली गई। बचपन में वे झुग्गी के पास के जिन खाली मैदानों और पार्कों में खेला करते थे, वहां अब आलीशान कॉलोनियां बन चुकी हैं। इनमें हर समय निजी सुरक्षा गार्ड तैनात रहते हैं और निगरानी रखते हैं कि झुग्गी के बच्चे कॉलोनी के पार्क में खेलने न चले आएं।
इस झुग्गी बस्ती के अधिकतर लोग मजदूर हैं, मिस्त्री हैं या पुताई का काम करते हैं। आस-पास बनी तमाम बड़ी-बड़ी इमारतों को इन्हीं लोगों ने अपनी मेहनत और पसीने से सींच कर खड़ा किया है। लेकिन जैसे-जैसे ये सुंदर इमारतें बनती गई, इन लोगों के लिए अपनी झुग्गी बचाए रखना भी मुश्किल होता गया। शहर के सौंदर्यीकरण में इनकी झुग्गियां बट्टा लगाती थी लिहाज़ा इन्हें हटा लेने का दबाव लगातार बढ़ने लगा।
दिल्ली में क़रीब सात सौ झुग्गी बस्तियां हैं जिनमें रहने वाले परिवारों की कुल संख्या चार लाख से ज्यादा है। इनमें से लगभग 75% झुग्गियां केंद्र सरकार के अलग-अलग विभागों या मंत्रालयों की जमीन पर बसी हैं।
21वीं सदी शुरू होते-होते ये दबाव बेहद बढ़ गया। भारत को राष्ट्रमंडल खेलों का मेज़बान बनना था और इसके लिए दिल्ली को दुल्हन की सजाना शुरू हुआ। इस सजावट में झुग्गियां बड़ा रोड़ा बन रही थी लिहाज़ा एक-एक कर कई झुग्गियां गिराई जाने लगी।
अरुण बताते हैं, ‘कुछ झुग्गी वालों का पुनर्वास हुआ और बाकी सबको बिना किसी पुनर्वास के ही उजाड़ दिया गया। हमें भी कह दिया गया था कि दिल्ली छोड़ कर चले जाओ।’
इसी झुग्गी के रहने वाले 60 वर्षीय महेंद्र दास याद करते हैं, ‘उस वक्त शीला दीक्षित मुख्यमंत्री हुआ करती थी। हम उसके पैरों में गिर गए थे और बहुत गिड़गिड़ाए थे कि हमारे घर मत उजाड़ो। लेकिन, उसने हमारी एक न सुनी और पूरी बस्ती पर बुलडोजर चढ़ा दिया। कई साल से जोड़-जोड़ जो बनाया था वो एक ही बार में रौंद दिया गया। कई रात हम अपने छोटे-छोटे बच्चों के साथ सड़कों पर सोए।’
वक्त बीता तो महेंद्र दास और उनकी झुग्गी वालों के घाव भी धीरे-धीरे भरने लगे। इन लोगों ने उसी नाले के किनारे एक बार फिर अपना आशियाना बसा लिया, जहां से इन्हें उखाड़ दिया गया था।
महेंद्र की पत्नी गीता दास कहती हैं, ‘झुग्गी में कौन रहना चाहता है? यहां बहुत दिक्कत होती है। बरसात में नाले का सारा गंदा पानी हमारे घरों में भर जाता है। जब से ये बारापुला बना है, दिक्कत और भी बढ़ गई है। रात में कई बार शराबी इस पुल पर खड़े होकर लड़कियों को अश्लील इशारे करते हैं, हमारी झुग्गियों पर पेशाब कर देते हैं और कूड़ा-कचरा-बियर की बोतलें हमारे ऊपर फेंकते हैं। लेकिन, यहां कम से कम हमारे सर पर छत है इसलिए झुग्गी में रहते हैं।’
ऐसी नारकीय स्थिति में जीने को मजबूर इन झुग्गी वालों के लिए बीता साल कुछ खुशियां लेकर आया। दिल्ली शहरी आश्रय सुधार बोर्ड यानी डूसिब ने तय किया कि इन लोगों का पुनर्वास होगा और इन्हें झुग्गी के बदले फ्लैट आवंटित किए जाएंगे। इसके लिए झुग्गियों का सर्वे किया गया और लोगों से पुनर्वास की रक़म भी जमा करवाई गई। अनुसूचित जाति के लिए 31 हजार रुपए और सामान्य वर्ग के लिए एक लाख 42 हजार की रक़म तय की गई।
इस झुग्गी के लगभग सभी लोग यह रक़म जमा कर चुके हैं। लेकिन क़रीब डेढ़ साल बीत जाने के बाद भी जब आगे कोई कार्रवाई नहीं हुई तो इन लोगों मन में कई सवाल उठने लगे हैं। ये सवाल इसलिए भी मज़बूत होते हैं क्योंकि दिल्ली में हजारों लोग ऐसे भी हैं जो बीते 12-13 साल से पुनर्वास की राह देख रहे हैं और जिनका पुनर्वास अदालत की फाइलों में कहीं उलझ कर रह गया है। राजेंद्र पासवान ऐसे ही एक व्यक्ति हैं।
राजेंद्र राजघाट के पीछे यमुना किनारे बसी एक झुग्गी बस्ती में रहा करते थे। साल 2007 में जब यह झुग्गी बस्ती गिराई गई तो इन लोगों से पुनर्वास का वादा किया गया। इसके लिए राजेंद्र पासवान ने उस दौर में 14 हजार रुपए का भुगतान भी किया और जमीन आवंटित होने का इंतजार करने लगे। उनका ये इंतजार आज तक ख़त्म नहीं हुआ है। उनके साथ ही उस बस्ती के क़रीब नौ सौ अन्य परिवार भी इसी इंतजार में बीते 13 सालों से आस लगाए बैठे हैं।
झुग्गी के लोग शहर में ही मजदूरी करते हैं और इनकी महिलाएं आस-पास की कोठियों या बड़ी इमारतों में घरेलू काम के लिए जाती हैं।
डूसिब के आंकड़े बताते हैं कि दिल्ली में कुल 45,857 ऐसे फ्लैट या तो बन चुके हैं या दिसम्बर 2021 तक बनकर तैयार हो जाएंगे, जिनमें झुग्गी बस्ती के लोगों को बसाया जाना है। इनमें से अधिकतर फ्लैट राष्ट्रमंडल खेलों के दौरान ही बनाए गए थे जब तेजी से दिल्ली की झुग्गियां गिराई जा रही थी। लेकिन, इतने फ्लैट होने के बावजूद भी राजेंद्र पासवान जैसे लोगों को पुनर्वास के लिए सालों-साल इंतजार क्यों पड़ रहा है?
इस सवाल के जवाब में डूसिब के एक वरिष्ठ अधिकारी कहते हैं, ‘दिल्ली में झुग्गियों के पुनर्वास में कई अलग-अलग विभागों की भूमिका होती है। डूसिब भले ही पुनर्वास के लिए नोडल एजेंसी है लेकिन इसके अलावा रेलवे, डीडीए और दिल्ली कैंटोनमेंट बोर्ड जैसी केंद्रीय एजेंसियों की भी अहम भूमिका होती है। नियम ये है कि जिसकी जमीन पर झुग्गियां हैं उसी एजेंसी को पुनर्वास के लिए भुगतान करना होता है।’
ये अधिकारी आगे कहते हैं, ‘प्रत्येक झुग्गी के पुनर्वास में साढ़े सात लाख से लेकर साढ़े 11 लाख रुपए तक का खर्च होता है। फ्लैट तो बने हैं लेकिन जब तक कोई एजेंसी ये रक़म नहीं चुकाती, फ्लैट आवंटित नहीं हो सकते। इसीलिए कई मामलों में सालों-साल तक यह प्रक्रिया लटकी ही रह जाती है।’
दिल्ली में क़रीब सात सौ झुग्गी बस्तियां हैं जिनमें रहने वाले परिवारों की कुल संख्या चार लाख से अधिक बताई जाती है। इनमें से लगभग 75% झुग्गियां केंद्र सरकार के अलग-अलग विभागों या मंत्रालयों की जमीन पर बसी हैं। मसलन रेलवे, रक्षा मंत्रालय और डीडीए की जमीनों पर। इनके अलावा 25 % झुग्गियां दिल्ली सरकार की जमीनों पर हैं।
इस लिहाज़ से देखा जाए तो दिल्ली में झुग्गी बस्तियों के पुनर्वास की 75% जिम्मेदारी केंद्र सरकार की है जिनकी जमीनों पर 75% झुग्गियां हैं। डूसिब के अधिकारी दावा करते हैं कि बीते पांच सालों में उन्होंने 15 झुग्गी बस्तियों का पुनर्वास सफलता से कर दिया है। लेकिन झुग्गियों के पुनर्वास के ये कथित सफल प्रयोग दिल्ली में खोजने से भी नहीं मिलते।
सामाजिक कार्यकर्ता और झुग्गी बस्ती वालों के लिए मज़बूती से आवाज़ उठाने वाले दुनू रॉय बताते हैं, ‘सरकार की पुनर्वास नीति में बहुत ज़्यादा खामियां हैं इसलिए ये पुनर्वास कभी सफल नहीं हो पाता।’ वे कहते हैं, ‘झुग्गी के लोगों के लिए अपनी झुग्गी सिर्फ़ रहने का ही नहीं बल्कि काम का भी ठिकाना होती है। झुग्गी बस्ती में लोग अपनी दहलीज़ और गलियों में ही छोटे-छोटे कई काम करते हैं।
लेकिन फ्लैट में न तो दहलीज़ का इस्तेमाल हो सकता है और न गलियारों का। ऊपर से ये फ्लैट इतने छोटे होते हैं कि इनमें किसी का भी गुज़ारा नहीं हो सकता। ये फ्लैट बनाए भी शहर से दूर गए हैं इसलिए भी यहां लोग रहना पसंद नहीं करते क्योंकि वहां उनके लिए खाने-कमाने के कोई साधन ही नहीं है।’
हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली की 140 किलोमीटर रेलवे लाइन के सेफ्टी ज़ोन में बनी क़रीब 48 हजार झुग्गियों को तोड़ने का आदेश दिया था।
दुनू रॉय सरकार की नीयत पर भी सवाल उठाते हैं। वे कहते हैं कि सरकारें भी नहीं चाहती कि ये झुग्गी वाले ठीक से बस जाएं। क्योंकि, अगर ये अच्छे से बस गए तो सस्ता श्रम जो इनसे मिलता है, वो कहां से आएगा। झुग्गी के लोग शहर में ही मज़दूरी करते हैं और इनकी महिलाएं आस-पास की कोठियों या बड़ी इमारतों में घरेलू काम के लिए जाती हैं।
ये लोग शहर से दूर कैसे रह सकते हैं। इसलिए जिन्हें फ्लैट मिलते भी हैं वो इसे बेचने को मजबूर हो जाते हैं। बिल्डर इन झुग्गी वालों से सस्ते दामों पर ये फ्लैट ख़रीद लेते हैं और फिर तीन-चार फ्लैट को मिलाकर एक रहने लायक़ फ्लैट तैयार करके उसे महंगे दामों पर बेच देते हैं।
दिल्ली में क़रीब 45 हजार फ्लैट बन जाने के बाद भी उनमें झुग्गी वालों को नहीं बसाया जा सका है। उसका एक बड़ा कारण इनकी शहर से दूरी भी है। इसे ही देखते हुए साल 2015 में दिल्ली सरकार ने पुनर्वास नीति में बदलाव किया था। इस नीति में तय हुआ है कि अब झुग्गी वालों का पुनर्वास झुग्गी के पांच किलोमीटर के दायरे में ही किया जाएगा।
इस नियम को काफ़ी प्रभावशाली तो माना जा रहा है लेकिन ये धरातल पर उतर पाएगा, इसका यक़ीन फ़िलहाल कम ही लोगों को है। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली की 140 किलोमीटर रेलवे लाइन के सेफ्टी ज़ोन में बनी क़रीब 48 हजार झुग्गियों को तोड़ने का आदेश दिया था।
लेकिन, सोमवार को एक प्रेस नोट जारी करते हुए उत्तर रेलवे ने कहा है कि उनके अधिकारी लगातार दिल्ली और केंद्र सरकार के संबंधित विभागों से चर्चा कर रहे हैं और जब तक कोई ठोस फैसला नहीं ले लिए जाता तब तक ये झुग्गियां नहीं तोड़ी जाएँगी। ये सूचना रेलवे लाइन के पास बसे 48 हजार झुग्गी वालों के लिए थोड़ी राहत लेकर आई है।
लेकिन, इसके बावजूद भी झुग्गी वालों के पिछले अनुभव उन्हें परेशान होने के कई कारण दे देते हैं। महेंद्र दास जैसे सैकड़ों लोग बिना किसी पुनर्वास के झुग्गी टूटने का दर्द पहले भी झेल चुके हैं और राजेंद्र पासवान जैसे सैकड़ों अन्य लोग झुग्गी टूटने के 13 साल बाद भी पुनर्वास की बाट जोहते जिंदगी बिता रहे हैं। ऐसे में इन लोगों में स्वाभाविक डर है कि जब 12-13 साल पहले अपनी झुग्गियां खाली कर चुके लोगों का ही पुनर्वास अब तक पूरा नहीं हुआ तो इनका पुनर्वास कैसे और कब तक हो सकेगा।
शादी के दो साल बाद जब निशू को पता चला कि वो प्रेग्नेंट हैं तो उनकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा। उसी समय से निशू ने घर में आने वाले नए मेहमान को लेकर तैयारियां शुरू कर दी थीं। निशू और उनके पति ने होने वाले बच्चे के लिए नाम भी सोचने शुरू कर दिए थे।
जब लॉकडाउन लगा तो वो खुश थीं कि अब वो अपने पति के साथ अधिक समय बिता पाएंगी। लेकिन, कोविड महामारी की वजह से बदल गई दुनिया में उनकी ये खुशी ज्यादा दिन नहीं रह सकी। उन्हें सही से इलाज नहीं मिल सका, न ही वो समय पर जरूरी टेस्ट करवा सकीं। चौथे महीने में ही पेट में ही उनके बच्चे की मौत हो गई। वो अब इस दुख से उबरने की कोशिश कर रही हैं।
निशू अकेली नहीं है जो इस तकलीफ से गुजरी हैं। कोरोना संक्रमण की वजह से दुनियाभर में गर्भवती महिलाओं को भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ा है। भारत में महिलाओं के लिए हालात और भी चुनौतीपूर्ण रहे हैं। निशू कहती हैं, 'ना किसी डॉक्टर ने ही मुझे सही से देखा, ना ही मैं अपनी जांचें पूरी करवा सकी। मुझे तो बच्चे की मौत के दो हफ्ते बाद पता चला कि वो नहीं रहा। ये सब बहुत तकलीफदेह था।'
बच्चों के लिए काम करने वाली संयुक्त राष्ट्र की संस्था यूनिसेफ के मुताबिक, कोविड-19 महामारी की वजह से गर्भवती महिलाओं और नवजात बच्चों को जरूरी चिकित्सीय सेवाएं और पोषण मिलने में दिक्कतें हो रही हैं, जिसकी वजह से उन्हें अतिरिक्त खतरों का सामना करना पड़ सकता है।
यूनिसेफ के वैश्विक अनुमान के मुताबिक, दुनियाभर में महामारी के दौरान 11 करोड़ 60 लाख बच्चे पैदा होंगे। मांओं और नवजात बच्चों के सामने बेहद मुश्किल हालात हैं। लॉकडाउन और कर्फ्यू भी इनमें शामिल हैं। महामारी की वजह से स्वास्थ्य सेवाओं पर पहले से ही अतिरिक्त बोझ है। ऐसे में गर्भवती महिलाओं के लिए पर्याप्त मात्रा में स्वास्थ्य कर्मचारी उपलब्ध होना भी एक चुनौती ही है।
इलाज नहीं मिलने से बच्चे की मौत
इंदौर की शाइस्ता को प्रेग्नेंसी के दौरान सही इलाज नहीं मिल पाया। जब वो डिलीवरी के लिए सरकारी अस्पताल पहुंची तो उन्हें वहां से भगा दिया गया। वो एक निजी अस्पताल गईं तो वहां इतने पैसे मांगे गए कि दे पाना उनके परिवार के बस के बाहर की बात थी।
फिर उन्हें एक और अस्पताल ले जाया गया जहां उन्होंने मृत बेटे को जन्म दिया था। डॉक्टरों ने उन्हें बताया कि उनके बच्चे की एक दिन पहले ही पेट में ही मौत हो गई थी। ये 18 जून की बात थी। उस अनुभव को याद करके शाइस्ता अब भी सिहर उठती हैं।
भास्कर से बात करते हुए शाइस्ता कहती हैं, 'मैं प्रेग्नेंसी के दौरान अस्पताल गई थी। लेकिन कोई डॉक्टर मुझे हाथ लगाने को तैयार नहीं था। कोरोना की वजह से कोई छू नहीं रहा था। मेरी सोनोग्राफी भी नहीं की गई। मेरे बच्चे की दिल की धड़कन चैक नहीं की गई।'
शाइस्ता कहती हैं, 'नौ महीने बहुत परेशानी में गुजरे। मुझे सही से इलाज नहीं मिला। मुझे लगता है कि अगर मुझे सही समय पर सही इलाज मिल जाता तो मेरा बच्चा बच जाता।' अपनी डिलीवरी के दिन को याद करते हुए वो कहती हैं, ' डिलीवरी के समय किसी अस्पताल ने मुझे लिया नहीं। मैं दर्द से तड़प रही थी, लेकिन कोई डॉक्टर देखने को तैयार नहीं था। मुझे बहुत दर्द था लेकिन सरकारी अस्पताल में किसी ने मुझे देखा तक नहीं। हमें वहां से भगा दिया गया।'
24 साल की शाइस्ता दो बच्चों की मां हैं। ये उनकी तीसरी प्रेग्नेंसी थी। बच्चे की मौत के बाद वो अवसाद में चली गईं थीं। वो कहती हैं, 'मैं डिप्रेशन में चली गई थी। मुझे अपने दोनों बच्चों का कोई होश नहीं था। मैं हर समय बस अपने बेटे के बारे में ही सोचती रहती थी। मैं इतनी तकलीफ से गुजरी और मेरा बच्चा भी नहीं बच सका।'
शाइस्ता इसके लिए किसी को दोषी मानने के बजाए अपनी किस्मत को ही ज्यादा जिम्मेदार मानती हैं। वो कहती हैं, 'अब तो मैं बस यही चाहती हूं कि मेरे दिल को सब्र आ जाए और मुझे अपने बच्चे की याद ना आए।'
प्रेग्नेंसी को एंजॉय नहीं कर पाई
नोएडा की रहने वाली विनीता सिंह इस समय सात महीने की गर्भवती हैं। इन दिनों वो अपना पूरा ख्याल रख रही हैं। लेकिन, लॉकडाउन के शुरुआती दिनों में उन्हें भी कई तरह की दिक्कतों का सामना करना पड़ा।
विनीता बताती हैं, 'मार्च में मुझे अपनी प्रेग्नेंसी के बारे में पता चला। शुरू में हम रिलेक्स थे। लेकिन, जैसे-जैसे लॉकडाउन बढ़ता गया, हमारी परेशानियां भी बढ़ती गईं। जब हमें अल्ट्रासाउंड कराने थे, कोई अल्ट्रासाउंड सेंटर ओपन नहीं थे। कोई डॉक्टर अपॉइंटमेंट नहीं देना चाहती थीं।' वो कहती हैं, 'बहुत कोशिश के बाद हमें डॉक्टर की अपॉइंटमेंट मिल सकी। आठवें वीक में हम पहला अल्ट्रासाउंड करा पाए।'
विनीता की समस्या सिर्फ ये ही नहीं थी कि डॉक्टर नहीं मिल पा रहीं थीं। लॉकडाउन की वजह से उन्हें घर से बाहर निकलने में भी बहुत दिक्कतें हो रहीं थीं। वो कहती हैं, 'रास्ते में पुलिस हर जगह रोककर पूछ रही थी। घर से निकल पाना ही मुश्किल था।'
वो कहती हैं कि जब कई डॉक्टरों ने अपॉइंटमेंट देने से इनकार कर दिया तो फिर वो एक पहचान की डॉक्टर के पास गईं जो उन्हें देखने के लिए तैयार हुईं। जैसे-जैसे देश में कोरोना संक्रमण के मामले बढ़ रहे थे। विनीता का तनाव भी बढ़ रहा था। जून में नोएडा में कई अस्पतालों के चक्कर काटने के बाद रास्ते में ही एक गर्भवती महिला के दम तोड़ने की खबर ने उन्हें बहुत परेशान किया।
वो कहती हैं, 'शुरूआत में हम न्यूज़ बहुत देख रहे थे। जब दिल्ली-एनसीआर में लेबर पेन के दौरान महिलाओं की मौत की खबरें देखीं तो बहुत डर लगता था। इतना तनाव होता था कि नींद नहीं आती थी, फिर मैंने न्यूज़ ही देखना छोड़ दिया। मेडिटेशन शुरू किया जिससे बहुत मदद मिली। उन्हें इस बात का भी डर सता रहा था कि कहीं कोरोना संक्रमण न हो जाए। अपने आप से अधिक चिंता उन्हें अपने होने वाले बच्चे की थी।'
वो कहती हैं, 'बाहर जाती थी तो डर लगता था। हल्की सी छींक भी आ जाती थी तो लगता था कहीं कोरोना ना हो जाए। अब मैं न्यूज़ नहीं देखती हूं। बस पूरी कोशिश यही है कि कोरोना से बचा जाए। कोरोना महामारी की वजह से विनीता समय पर अपना अल्ट्रासाउंड भी नहीं करा पाईं। उनका दूसरा अल्ट्रासाउंड छूट गया था।'
दिल्ली की ही रहने वाली आंत्रप्रेन्योर और सोशल मीडिया इंफ्लूएंसर अहाना मेहता कोरोना के चलते तनाव में आ गईं, जिससे उनकी डिलिवरी एक महीना पहले हो गई।
विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक, 14-49 उम्र वर्ग की महिलाओं के लिए गर्भावस्था के दौरान प्रसवपूर्ण कम से कम चार चैक-अप (एंटेनेटल केयर चैक अप- एएनसी) जरूरी हैं। नेशनल फेमिली हेल्थ सर्वे के मुताबिक, भारत में सिर्फ़ 51 प्रतिशत महिलाओं के ही चार या इससे अधिक एएनसी किए गए।
प्रसव के पहले किए जाने वाले इन चैक अप से डॉक्टरों को पता चल जाता है कि किस गर्भवती महिला या उनके बच्चे को खतरा है। ये पता चलने के बाद निवारक दवाएं दी जाती हैं। ऐसे में सही समय पर जांच न हो पाने से मां या बच्चे को होने वाले खतरे का पता नहीं चल पाता।
विनीता का स्वास्थ्य तो अब बेहतर है लेकिन, उन्हें अफसोस है कि वो लॉकडाउन की वजह से अपनी प्रेग्नेंसी को पूरी तरह एंजॉय नहीं कर पाईं। वो कहती हैं, 'कोरोना में सिर्फ़ एक चीज़ सही हुई है। मेरे पति घर से काम कर रहे हैं और इस दौरान हम साथ में काफी समय बिता पाए।'
कोविड के स्ट्रेस ने प्रभावित की प्रेग्नेंसी
दिल्ली की ही रहने वाली आंत्रप्रेन्योर और सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर अहाना मेहता मेहरोत्रा की प्रेग्नेंसी सही चल रही थी। उन्हें कुछ ख़ास दिक्कतों का सामना नहीं करना पड़ा। लेकिन, कोविड की वजह से उन्होंने इतना तनाव ले लिया कि उनकी डिलीवरी एक महीना पहले ही हो गई। अहाना कहती हैं, 'हमारे परिवार में किसी को कोविड हो गया था लेकिन उन्हें लक्षण नहीं थे। मैं भी उनसे मिली थी। मैं डरी हुई थी कि कहीं मुझे कोविड न हो जाए।'
वो कहती हैं, 'कोविड की वजह से मैंने तनाव ले लिया। मैं इस तनाव में थी कि कहीं मेरे बच्चे को कोविड न हो जाए। मैं हर वक्त रोती रहती थी। मुझे लगता है कि इसका असर मेरी प्रेग्नेंसी पर हुआ और मेरी डिलीवरी समय से पहले करनी पड़ी। मुझे लगता है कि वो स्ट्रेस मुझे खा गया। जब तक मेरी कोविड रिपोर्ट नेगेटिव नहीं आई, मैं रोती ही रही। रिपोर्ट आने में एक हफ्ते का वक्त लग गया था।'
अहाना को चिंता थी कि यदि उनकी कोविड रिपोर्ट पॉजीटिव आ गई तो कोई अस्पताल उन्हें डिलीवरी के लिए भर्ती नहीं करेगा। वो कहती हैं, 'मैं सोचती रहती थी कि कहीं मुझे कोविड अस्पताल में डिलीवरी न करानी पड़ जाए और कहीं मेरे बच्चे को कुछ ना हो जाए। मैंने इसका बहुत स्ट्रेस ले लिया था।'
अहाना जब अस्पताल में नियमित चैक अप कराने गईं तो उनसे कहा गया कि उनके बच्चे की तुरंत डिलीवरी करनी होगी। उन्हें दो घंटे का समय दिया गया था। वो कहती हैं, 'सर्जरी के दौरान मेरे पति को भी अंदर नहीं जाने दिया गया। यह सब बहुत डरावना था। मैं बहुत घबराई हुई थी। मुझे लग रहा था कि शायद मैं बच ही नहीं पाउंगी।' अहाना का बेटा अब दो महीने का है और बिलकुल स्वस्थ है।
वो कहती हैं, 'मुझे इस बात की खुशी है कि मेरे पति ने मेरा पूरा साथ दिया और मेरा ध्यान रखा। उनके साथ ने तनाव को कुछ कम किया।'
कराना पड़ा सी-सेक्शन
नोएडा की ही रहने वाली पैंतीस साल की प्रियंका ने हाल ही में दूसरे बच्चे को जन्म दिया है। उनका डिलीवरी का अनुभव अच्छा रहा लेकिन लॉकडाउन की वजह से क्लिनिक बंद हो जाने से उन्हें काफी परेशानी का सामना करना पड़ा।
वो कहती हैं, 'कोविड की वजह से चीजें सही से मैनेज नहीं हो पा रही हैं। पहले मेरा कोविड टेस्ट कराया गया। मेरी नार्मल डिलीवरी भी हो सकती थी। लेकिन, उन्होंने सी-सेक्शन ही किया। क्योंकि वो दो-तीन दिन से ज्यादा समय देने को तैयार नहीं थे। उनका कहना था कि अभी रिपोर्ट नेगेटिव है, फिर पॉजीटिव आ गई तो दिक्कत होगी। मुझे सी-सेक्शन ही करवाना पड़ा।'
प्रियंका प्रेग्नेंसी के शुरुआती महीनों में जिस क्लिनिक में इलाज करा रहीं थी वो लॉकडाउन के दौरान बंद हो गया। दो महीनों तक वो किसी डॉक्टर को अपने आप को नहीं दिखा सकीं। फिर एक मेटरनिटी होम में उन्होंने अपना इलाज शुरू किया।
वो कहती हैं, 'कोविड की वजह से डॉक्टरों ने अपने क्लिनिक बंद कर दिए थे। उससे बहुत परेशानी हुई। मैं दो महीने तक किसी को दिखा ही नहीं पाई थी। जब हालात कुछ बेहतर हुए तो मैं अपने टेस्ट करा पाई।'
नोएडा की ही रहने वाली पैंतीस साल की प्रियंका ने हाल ही में दूसरे बच्चे को जन्म दिया है। प्रेग्नेंसी के शुरुआती महीनों में जिस क्लिनिक में वह इलाज करा रहीं थी वो लॉकडाउन के दौरान बंद हो गया। दो महीनों तक वो किसी डॉक्टर को अपने आप को नहीं दिखा सकीं।
लॉकडाउन की वजह से उनके परिजन भी उनके पास नहीं आ सके। ये भी उनके लिए काफी मुश्किल था। वो कहती हैं, 'डिलीवरी के समय मेरे परिजन या रिश्तेदार मेरे पास नहीं आ सके। मेरी घरेलू नौकरानी भी नहीं थी। इस सबकी वजह से मुझे बहुत दिक्कत हुई। मुझे सारे काम खुद ही करने पड़े।'
आशा को भी है निराशा
भारत सरकार गर्भवती महिलाओं और बच्चों के स्वास्थ्य की देखभाल के लिए कई योजनाएं चलाती हैं। इन योजनाओं का ही असर है कि भारत में मातृ मृत्यु दर में 1990 के मुकाबले 77 फीसदी की कमी आई है। साल 1990 में प्रत्येक 1 लाख जन्म के दौरान 556 मांओं की मौत हो जाती थी। साल 2016 में ये आंकड़ा 130 था।
इस सुधार की बड़ी वजह केंद्र और राज्य सरकारों की योजनाएं हैं जिनमें साल 2016 में शुरू की गई प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान भी शामिल है। इन योजनाओं को जमीन पर लागू करने की ज़िम्मेदारी आशा वर्करों की होती है।
लेकिन, आशा कार्यकर्ताओं को कोविड महामारी के दौरान के अनुभव बहुत अच्छे नहीं है। इंदौर की आशा कार्यकर्ता 35 वर्षीय नसरीन खानम कहती हैं कि सबसे बड़ी दिक्कत ये है कि अस्पताल में डिलीवरी के दौरान आशा वर्कर को गर्भवती महिला के साथ नहीं जाना दिया जाता है। जिससे मरीजों को परेशानी होती है। कई महिलाएं ऐसी होती हैं जिन्हें निजी अस्पतालों में सर्जरी करानी पड़ती है, क्योंकि वो सरकारी अस्पताल में अकेले डर महसूस करती हैं।
वो कहती हैं, 'सरकारी अस्पतालों में भीड़ रहती है। कई बार हम गर्भवती महिलाएं को लेकर आती तो हैं लेकिन उनकी जांच या इलाज नहीं हो पाता है। बार-बार प्रेग्नेंट महिलाएं जा भी नहीं पाती है। कई महिलाएं जाना नहीं चाहती हैं, हमें ज़ोर देकर उन्हें ले जाना पड़ता है।'
नसरीन की शिकायत है कि कोविड महामारी के दौरान अस्पतालों का व्यवहार बदल गया है जिससे आशा कार्यकर्ताओं को भी बहुत दिक्कतें आ रही है। वो कहती हैं, 'कई बार अस्पतालों से मरीजों को धक्का मार कर भगा देते हैं। फिर मजबूरी में गर्भवती महिलाओं को निजी अस्पताल ले जाना पड़ता है, जहां उन्हें इलाज बहुत महंगा पड़ता है।'
सरकारी डॉक्टरों की परेशानियां भी कम नहीं
कोरोना महामारी की वजह से निजी अस्पतालों के बंद होने या मरीजों को ना देखने का बोझ सरकारी अस्पतालों पर पड़ा है। इंदौर के पीसी सेठी अस्पताल में महिला रोग विशेषज्ञ डॉ. ज्योति सिमलोट कहती हैं कि कोरोना महामारी की वजह से सरकारी अस्पतालों में अधिक गर्भवती महिलाएं पहुंच रही हैं।
वो कहती हैं, बीते छह माह से गर्भवती महिलाओं को अपने रूटीन चैकअप के लिए बहुत परेशान होना पड़ रहा है। निजी अस्पतालों में डिलीवरी और सीजेरियन के चार्ज बढ़ा दिए गए हैं, जिसकी वजह से गर्भवती महिलाएं सरकारी अस्पतालों में आ रही हैं।
डॉ. ज्योति सिमलोट इंदौर के पीसी सेठी अस्पताल में महिला रोग विशेषज्ञ हैं।
डॉ. ज्योति बताती हैं, 'सरकारी अस्पतालों में आने वाली गर्भवती महिलाओं की संख्या अचानक से बढ़ी है। पहले हमारे अस्पताल में रोजाना 15 डिलीवरी होती थीं, अब 25 तक होती हैं। पहले ओपीडी में रोज डेढ़ सौ के करीब महिलाएं आती थीं। अब ढाई सौ से तीन सौ तक आ रही हैं। इस वजह से सोशल डिस्टेंसिंग बनाए रखने में भी दिक्कत आ रही है।'
वो कहती हैं, 'गर्भवती महिलाएं अंतिम महीनों में सरकारी अस्पतालों का रुख कर रही हैं। इसकी वजह से अस्पताल में ठीक तरह से प्रबंधन में दिक्कतें आ रही हैं। कई बार बेड भी उपलब्ध नहीं हो पाते हैं। मेरी सलाह ये है कि कोरोना संक्रमण की स्थिति में बहुत जरूरी होने पर ही अस्पताल आया जाए।'
डॉ. ज्योति बताती हैं कि अंतिम महीनों में सरकारी अस्पताल में आने वाली ज्यादातर गर्भवती महिलाओं का ये कहना होता है कि निजी अस्पताल का खर्च अब उनके बस में नहीं है, जिसकी वजह से वो अब सरकारी अस्पताल में आ रही हैं।
विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक, भारत में होने वाली 79 फीसदी डिलीवरी अस्पतालों में होती हैं। यूनिसेफ के आंकड़ों के मुताबिक, भारत में हर बीस मिनट में एक महिला की मौत प्रेग्नेंसी या प्रसव के दौरान जटिलताओं की वजह से होती है।
साल 2017 में भारत में तीस हज़ार से अधिक महिलाओं की मौत प्रसव या प्रेग्नेंसी के दौरान हुई थी। भारत के नेशनल हेल्थ पोर्टल के मुताबिक देश की कुल प्रेग्नेंसी में से 20-30 फीसदी तक हाई रिस्क प्रेग्नेंसी होती हैं। ऐसे में गर्भवती महिलाओं के लिए स्वास्थ्य सेवाओं का उपलब्ध होना बेहद जरूरी हो जाता ।
विडंबना ये है कि कोरोना महामारी के काल में जरूरी स्वास्थ्य सेवाएं भी महिलाओं को नहीं मिल पा रही हैं। और महामारी की आड़ में एक और महामारी फैलती नजर आती है, जिस और तुरंत ध्यान दिए जाने की जरूरत है।
पहले सोचो, योजना बनाओ, फिर खूबियों और खामियों को समझने के बाद काम शुरू करो। सर मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया के जीवन की फिलॉस्फी यही रही है। इन्होंने इंजीनियरिंग के क्षेत्र में वो उपलब्धियां हासिल कीं, जो इतिहास में अमर हो गईं। आज इनका जन्मदिन है, जिसे इंजीनियर्स-डे के रूप में सेलिब्रेट किया जाता है। सर मोक्षगुंडम ने अपने दौर में इंजीनियरिंग के क्षेत्र में ऐसे कीर्तिमान रचे जिसका लोहा अंग्रेजों ने भी माना। इंजीनियर्स डे पर उनके जीवन के उन किस्सों को जानिए, जिसने सबको चौंकाया...
जिन अंग्रेजों ने मजाक उड़ाया, उन्हीं ने मांगी माफी
विश्वेश्वरैया के जीवन में सबसे दिलचस्प किस्सा अंग्रेजों से जुड़ा है। एक बार वह अंग्रेजों के साथ ट्रेन में सफर कर रहे थे। सांवले रंग और सामान्य कद काठी वाले विश्वेश्वरैया को अनपढ़ समझकर अंग्रेजों ने मजाक उड़ाना शुरू कर दिया। इस पर उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया। ट्रेन तेज रफ्तार में चल रही थी, वे अचानक उठे और चेन खींच दी। ट्रेन वहीं रुक गई।
यात्रियों ने उन्हें बुरा भला कहना शुरू कर दिया। थोड़ी देर बाद गार्ड के सवाल करने पर उन्होंने कहा- मैंने चेन खींची है। मेरा अनुमान है कि करीब 220 गज की दूरी पर रेल की पटरी उखड़ी हुई है। गार्ड ने पूछा- यह आपको कैसे पता चला। उन्होंने जवाब दिया- सफर के दौरान अहसास हुआ कि ट्रेन की गति में अंतर आ गया है। पटरी की तरफ से आने वाली आवाज में बदलाव हुआ है। उनकी इस बात की पुष्टि करने के लिए गार्ड जब कुछ दूर आगे चला तो दंग रह गया। वहां पर पटरी के नट-बोल्ट बिखरे पड़े थे। अंग्रेज यह देखकर दंग रह गए और उनसे माफी मांगी।
इकलौते इंजीनियर जिसने 75 फुट ऊंची सीढ़ी पर चढ़ने का साहस जुटाया
एक बार देश के कुछ चुनिंदा इंजीनियरों को अमेरिका भेजा गया ताकि वे वहां की फैक्ट्रियों की वर्किंग को समझ सकें। फैक्ट्री के एक ऑफिसर ने कहा, अगर मशीन को समझना चाहते हैं तो 75 फुट ऊंची सीढ़ी पर चढ़ना पड़ेगा।
इतनी ऊंची सीढ़ी देखकर सभी इंजीनियर पीछे हट गए, लेकिन उस समूह में सबसे उम्रदराज होने के बाद भी डॉ. मोक्षगुंडम ने कहा, मैं देखूंगा। वह सीढ़ी पर चढ़े और मशीन को देखा। उनके बाद सिर्फ दो और इंजीनियर चढ़े। उनका साहस देखकर अमेरिका की फैक्ट्री में लोगों ने तारीफ की।
लम्बी उम्र का रहस्य बताया
102 साल की उम्र में डॉ. मोक्षगुंडम का निधन हुआ। उम्र के इस पड़ाव पर भी वह अंतिम समय तक एक्टिव रहे। एक बार इनसे इतनी लम्बी उम्र का रहस्य पूछा गया है तो उन्होंने जवाब दिया- जब बुढ़ापा मेरा दरवाजा खटखटाता है तो मैं भीतर से जवाब देता हूं कि विश्वेश्वरैया घर पर नहीं है। फिर वह निराश होकर लौट जाता है। बुढ़ापे से मेरी मुलाकात ही नहीं हो पाती है तो वह मुझ पर कैसे हावी हो सकता है।
इसलिए कर्नाटक के भागीरथ कहलाए
डॉ. मोक्षगुंडम को कर्नाटक का भागीरथ भी कहा जाता है। मात्र 32 साल की उम्र में उन्होंने सिंधु नदी से सुक्कुर कस्बे तक पानी पहुंचाने के लिए एक प्लान बनाया। वो प्लान सभी इंजीनियरों को पसंद आया। उन्होंने बांध से पानी के बहाव को रोकने वाले स्टील के दरवाजे बनवाए, जिसकी तारीफ ब्रिटिश अधिकारियों ने भी की। आज भी इसका इस्तेमाल किया जा रहा है। विश्वेश्वरैया ने मूसा औरा इसा नाम की दो नदियों के पानी को बांधने के लिए भी प्लान तैयार किए। इसके बाद उन्हें मैसूर का चीफ इंजीनियर नियुक्त किया गया।
वो उपलब्धियां जो डॉ. मोक्षगुंडम के नाम रहीं
डॉ. मोक्षगुंडम के नाम कई उपलब्धियां रही हैं। इनमें कृष्णराजसागर बांध, भद्रावती आयरन एंड स्टील वर्क्स, मैसूर संदल ऑयल एंड सोप फैक्टरी, मैसूर विश्वविद्यालय, महारानी कॉलेज, बैंक ऑफ मैसूर का निर्माण, वो उपलब्धियां हैं जो लोगों की जुबां पर हैं। इन्होंने भारत की एक बड़ी चीनी मिल स्थापित करवाने के अलावा भी कई बड़े निर्माण कराए।
1912 में जब मैसूर के महाराज ने इन्हें अपना मुख्यमंत्री घोषित किया तो इन्होंने शिक्षा के क्षेत्र में काम किया। इनके कार्यकाल में स्कूलों की संख्या 4500 से बढ़कर 10,500 तक पहुंची। बेंगलुरू में हिन्दुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड और मुम्बई में प्रीमियर ऑटोमोबाइल फैक्ट्री भी इनकी मेहनत का नतीजा थी।
मैसूर में जन्मे सर विश्वेश्वरैया 12 साल के थे जब उनके पिता का निधन हुआ। चिकबल्लापुर से शुरुआती पढ़ाई के बाद वे बीए की डिग्री के लिए बेंगलुरू चले गए। 1881 में ग्रेजुएशन पूरा करने के बाद पुणे के कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग से पढ़ाई पूरी की।
कंगना रनोत हिमाचल लौट गई हैं, मगर शिवसेना पर उनके हमले बंद नहीं हो रहे। उधर, 4 हजार लोगों के कोरोना टेस्ट के बाद संसद का मानसून सत्र शुरू हो चुका है। चलिए, शुरू करते हैं मॉर्निंग न्यूज ब्रीफ।
आज इन 2 इवेंट्स पर रहेगी नजर
1. प्रधानमंत्री मोदी बिहार के लिए 541 करोड़ रुपए के 7 प्रोजेक्ट्स का शिलान्यास करेंगे।
2. रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह संसद में एलएसी पर जारी भारत-चीन मामले पर बयान दे सकते हैं।
अब कल की 7 महत्वपूर्ण खबरें
1. मानसून सत्र का पहला दिन, 17 सांसद पॉजिटिव मिले
सोमवार से 17वीं लोकसभा का चौथा सत्र शुरू हुआ। जदयू सांसद हरिवंश राज्यसभा के उप-सभापति चुने गए। संसद के एंट्री पॉइंट पर टेम्परेचर चेक किया गया। अब तक 17 सांसदों की रिपोर्ट पॉजिटिव आई है। इनमें 12 सांसद भाजपा के हैं। -पढ़ें पूरी खबर
2. कंगना हिमाचल लौटीं, आदित्य पर साधा निशाना
5 दिन मुंबई में बिताने के बाद कंगना हिमाचल लौट गईं। वहां पहुंचते ही ट्वीट किया, “महाराष्ट्र के सीएम की समस्या यह है कि मैंने सुशांत सिंह राजपूत के हत्यारों का पर्दाफाश किया, जो उनके प्यारे बेटे आदित्य ठाकरे के साथ घूमते हैं। अब वे मुझे फिक्स करना चाहते हैं, देखते हैं कि कौन किसे फिक्स करता है।” -पढ़ें पूरी खबर
3. भारत के बड़े लोगों पर चीन की जासूसी नजर
चीनी सरकार से जुड़ी एक बड़ी डेटा कंपनी 10 हजार भारतीय लोगों और संगठनों की निगरानी कर रही है। इनमें प्रधानमंत्री मोदी, राष्ट्रपति कोविंद और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया समेत 10 हजार बड़े लोगों और संस्थाओं का नाम शामिल है। इंडियन एक्सप्रेस की इन्वेस्टिगेशन में ये खुलासा हुआ है। -पढ़ें पूरी खबर
4. चॉकलेट सोल्जर
चीनी सैनिक चॉकलेट सोल्जर हैं। यह शब्द जॉर्ज बर्नार्ड शॉ के नाटक ‘आर्म्स एंड द मैन’ से लिया गया है। जो लोग सेना में पैसों और फायदे के लिए भर्ती होते हैं और गोली का सामना करने से डरते हैं, उन्हें चॉकलेट सोल्जर कहा जाता है। चीन के बारे में ऐसा इसलिए कहा जा रहा है क्योंकि पिछले दिनों जब भारत ने लद्दाख की अहम चोटियों पर कब्जा किया, तब एक चीनी अफसर ने काउंटर अटैक करने से इनकार कर दिया। -पढ़ें पूरी खबर
5. भारत-चीन सीमा से शौर्य की सबसे मजबूत कहानी
कर्नल रणबीर सिंह जमवाल तीन बार एवरेस्ट फतह कर चुके हैं। उन्होंने ही भारतीय सैनिकों को 18 हजार फीट की ऊंचाई पर कम ऑक्सीजन और माइनस तापमान के बीच ब्लैक टॉप तक पहुंचाया। वे देश में इकलौते हैं, जो दुनिया की सात सबसे ऊंची चोटियों को छूकर लौटे हैं। -पढ़ें पूरी खबर
6. टिकटॉक को खरीदने में ओरेकल ने बाजी मारी
चीनी कंपनी बाइटडांस के शॉर्ट वीडियो प्लेटफॉर्म टिकटॉक के अमेरिकी कारोबार को खरीदने में ओरेकल ने बाजी मारी। हालांकि, बाइटडांस ने इस साझेदारी का खंडन किया। वहीं, न्यूयॉर्क टाइम्स के मुताबिक, बाइटडांस ने टिकटॉक को चलाने के लिए ओरेकल को बतौर टेक्नीकल पार्टनर चुना है। -पढ़ें पूरी खबर
7. अगले महीने से सिनेमा हॉल खोलने की तैयारी
अनलॉक 4.0 की गाइडलाइंस 30 सितंबर को खत्म हो रही है। ऐसी उम्मीद है कि 1 अक्टूबर से नई गाइडलाइंस में सिनेमा हॉल खोलने की अनुमति मिल जाए। पूरे देश में मूवी थिएटर 23 मार्च से बंद हैं। मल्टीप्लेक्स में भी कोरोनावायरस से सेफ्टी को लेकर विशेष इंतजाम किए जा रहे हैं। -पढ़ें पूरी खबर
अब 15 सितंबर का इतिहास
1860: भारत के सबसे बड़े इंजीनियर माने जाने वाले एम. विश्वेश्वरैया का जन्म हुआ। इसे देश में इंजीनियर्स डे के तौर पर मनाया जाता है।
1876: शरतचंद्र चट्टोपाध्याय का जन्म हुआ।
1959: दिल्ली में दूरदर्शन की शुरुआत हुई।
2008: अमेरिका के सबसे बड़े बैंकों में से एक लीमैन ब्रदर्स ने खुद को दिवालिया घोषित किया। यह वैश्विक मंदी के कारकों में से एक था।
जाते-जाते बात बांग्ला के सुप्रसिद्ध उपन्यासकार एवं लघुकथाकार शरतचन्द्र चट्टोपाध्याय की। आज ही के दिन उनका जन्म हुआ था।
from Dainik Bhaskar /national/news/kangana-now-names-uddhavs-son-chocolate-soldier-near-china-and-corona-to-17-mps-before-parliament-session-127720534.html
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आज हिंदी दिवस है। इस मौके पर हिंदी को बढ़ावा देने वाले महान विद्वानों के विचारों के साथ जानते हैं कि हिंदी नाम कहां से आया। हिंदी भाषा के लिए इस शब्द का प्राचीनतम प्रयोग 1424 के शरफुद्दीन यज्दी’ के ‘जफरनामा’ में मिलता है।
हिंदी शब्द का सम्बन्ध संस्कृत शब्द सिंधु से है। 'सिंधु' सिंध नदी को कहते थे और उसी आधार पर उसके भारत भूमि को सिंधु कहा जाने लगा। यह सिंधु शब्द ईरानियों के प्रभाव में ‘हिंदू’, हिंदी और फिर ‘हिंद’ हो गया।
इसी इतिहास के साथ कुछ प्रेरक हिंदी विचार, पढ़िए, अनुभूति कीजिए और साझा भी कर लीजिए...
चीन की सरकार से जुड़ी एक बड़ी डेटा कंपनी 10 हजार भारतीय लोगों और संगठनों की निगरानी कर रही है। इनमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी, उनका परिवार, कई कैबिनेट मंत्री और मुख्यमंत्री शामिल हैं। ज्यूडिशियरी, बिजनेस, स्पोर्ट्स, मीडिया, कल्चर एंड रिलीजन से लेकर तमाम क्षेत्रों के लोगों पर चीन की नजर है। यहां तक कि आपराधिक मामलों के आरोपियों की भी निगरानी की जा रही है। अंग्रेजी अखबार इंडियन एक्सप्रेस की इन्वेस्टिगेशन में ये खुलासा हुआ है।
चीन की निगरानी में ये बड़े लोग शामिल
1. नरेंद्र मोदी, प्रधानमंत्री 2. रामनाथ कोविंद, राष्ट्रपति 3. सोनिया गांधी, कांग्रेस अध्यक्ष 4. मनमोहन सिंह, पूर्व प्रधानमंत्री 5. राहुल गांधी, कांग्रेस नेता 6. प्रियंका गांधी, कांग्रेस नेता 7. बिपिन रावत, चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ 8. एस ए बोबडे, चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया 9. जी सी मुर्मू, कॉम्प्ट्रॉलर एंड ऑडिटर जनरल (CAG) 10. रतन टाटा, चेयरमैन (एमेरिटस), टाटा ग्रुप 11. गौतम अडाणी, चेयरमैन, अडाणी ग्रुप 12. सचिन तेंदुलकर, क्रिकेटर
8 केंद्रीय मंत्री 1. राजनाथ सिंह 2. निर्मला सीतारमण 3. रविशंकर प्रसाद 4. पीयूष गोयल 5. स्मृति ईरानी 6. वीके सिंह 7. किरिण रिजिजू 8. रमेश पोखरियाल निशंक
5 राज्यों के मुख्यमंत्री 1. शिवराज सिंह चौहान, मुख्यमंत्री, मध्य प्रदेश 2. अशोक गहलोत, मुख्यमंत्री, राजस्थान 3. उद्धव ठाकरे, मुख्यमंत्री, महाराष्ट्र 4. अमरिंदर सिंह, मुख्यमंत्री, पंजाब 5. ममता बनर्जी, मुख्यमंत्री, पश्चिम बंगाल
7 पूर्व मुख्यमंत्री 1. रमन सिंह, छत्तीसगढ़ 2. अशोक चव्हाण, महाराष्ट्र 3. के सिद्धारमैया, कर्नाटक 4. हरीश रावत, उत्तराखंड 5. लालू प्रसाद यादव, बिहार 6. भूपिंदर सिंह हुड्डा, हरियाणा 7. बाबूलाल मरांडी, झारखंड
नेताओं के परिवार वालों पर भी नजर 1. सविता कोविंद, राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की पत्नी 2. गुरशरण कौर, पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की पत्नी 3. जुबिन ईरानी, केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी के पति 4. सुखबीर सिंह बादल, केंद्रीय मंत्री हरसिमरत कौर के पति 5. डिंपल यादव, यूपी के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की पत्नी
तीनों सेनाओं के 15 पूर्व प्रमुखों की भी ट्रैकिंग
रिपोर्ट के मुताबिक चीन के शेनझेन शहर की झेन्हुआ डेटा इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी कंपनी भारतीयों की रियल टाइम मॉनिटरिंग कर रही है। इसके निशाने पर भारत के जो लोग और संगठन हैं, उनकी हर छोटी-बड़ी सूचना जुटाई जा रही है। इंडियन एक्सप्रेस ने 2 महीने तक बड़े डेटा टूल्स का इस्तेमाल करते हुए झेन्हुआ के मेटा डेटा की पड़ताल के आधार पर यह खुलासा किया है। इसके मुताबिक तीनों सेनाओं के 15 पूर्व प्रमुखों की भी ट्रैकिंग की जा रही है।
अब तक हमने महिलाओं को पानी भरते हुए यानी वाटर कैरियर के रूप में देखा है, लेकिन अब महिलाएं वाटर कैरियर से वाटर आंत्रप्रेन्योर बन रही हैं। वे लोगों को पीने के लिए साफ पानी भी मुहैया करा रही हैं और खुद आत्मनिर्भर भी बन रहीं हैं। महाराष्ट्र, तेलंगाना और यूपी समेत देश के 11 राज्यों में शहरी और ग्रामीण इलाकों में जहां पीने के लिए साफ पानी की सुविधा नहीं है, वहां वाटर एटीएम की शुरुआत हुई है। इसमें 1000 लोगों को रोजगार मिला है। इनमें बड़ी संख्या में महिलाएं भी जुड़ी हैं। कई गांवों में वाटर एटीएम का संचालन महिलाएं कर रही हैं।
35 साल की नेमुरी रानी हैदराबाद के विनायक नगर में रहती हैं। पहले वह हाउस वाइफ थीं, घर का काम करती थीं, लेकिन वे अब हर महीने 6-7 हजार रुपए बचा लेती हैं। उनके पति भी अब इस काम से जुड़ गए हैं। वे बाल नगर और उसके आसपास के इलाकों में पानी पहुंचाने का काम करते हैं। अब दोनों का गुजारा भी ठीक से होता है और बच्चों की पढ़ाई के लिए भी पैसे की कमी नहीं होती।
महाराष्ट्र के चंद्रपुर जिले के मधेली गांव की रहने वाली प्रांजलि अपने गांव में वाटर एटीएम चलाती हैं। वे बताती हैं कि पहले उनके गांव में पानी की बहुत दिक्कत थी। कई किलोमीटर दूर से पीने के लिए पानी लाना पड़ता था। दूषित पानी की वजह से गांव में कई लोग बीमार हो जाते थे। डायरिया और जॉन्डिस जैसी बीमारियां कॉमन थी, लेकिन जब से वाटर एटीएम की शुरुआत हुई है तब से यहां के लोगों का स्वास्थ्य बेहतर हुआ है।
दिनभर में जितनी कमाई होती है, उसका 50 फीसदी एटीएम संचालक को मिलता है और बाकी का 50 फीसदी मेंटेनेंस पर खर्च होता है।
प्रांजलि के साथ कुछ और भी महिलाएं काम करती हैं। वे अपना काम शिफ्ट में बांटकर करती हैं। जिसकी शिफ्ट में जितना पानी बिकता है उसके हिसाब से वे पैसे शेयर कर लेती हैं। प्रांजलि इसी पैसे से अपनी बेटी को पढ़ा रही हैं।
5 रुपए में 20 लीटर पानी
इस वाटर एटीएम से पांच रुपए में 20 लीटर साफ और शुद्ध पानी मिलता है। एक एटीएम से हर दिन करीब 250 केन पानी बिकता है। दिनभर में जितने रुपए की कमाई होती हैउसका 50 फीसदी एटीएम ऑपरेटर को मिलता है और बाकी का 50 फीसदी मेंटेनेंस पर खर्च होता है।
फसलवाडी की रहने वाली पी लक्ष्मी रोज वाटर एटीएम से पानी भरती हैं। कहती हैं कि पहले हमें पीने के लिए साफ पानी खरीदने पर भी मुश्किल से मिलता था। एक केन पानी के लिए 20 से 25 रुपए देने होते थे। पानी पहुंचाने वाले के आने का भी कोई टाइम फिक्स नहीं होता था। अक्सर वह देर से आता था, लेकिन अब तो अपने गांव में ही सस्ता और शुद्ध पानी मिल रहा है।
एक हजार लोगों को मिला रोजगार
वाटर एटीएम यानी आई जलशक्ति स्टेशन की शुरुआत पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर 2016 में तेलंगाना में हुई थी। तेलंगाना के मेदक जिले में सेव वाटर नेटवर्क नाम की एक संस्था ने सेल्फ हेल्प ग्रुप (एसएचजी) मॉडल के आधार पहला वाटर एटीएम इंस्टॉल किया गया। उसके कुछ ही महीने बाद उस जिले में 49 जगहों पर भी यह मशीन लगाई गई। उसके बाद धीरे-धीरे दूसरे राज्यों में भी इसका विस्तार हुआ।
अभी महाराष्ट्र, तेलंगाना, यूपी सहित देश के 11 राज्यों में इसकी शुरुआत हो गई है। 10 लाख से ज्यादा लोगों तक शुद्ध पानी पहुंच रहा है। अभी देशभर में 1000 लोग इससे जुड़े हैं, जिनमें करीब 30 फीसदी महिलाएं काम करती हैं।
इस वाटर एटीएम से पांच रुपए में 20 लीटर साफ और शुद्ध पानी मिलता है। एक एटीएम से हर दिन करीब 250 केन पानी बिकता है।
सेव वाटर नेटवर्क की वाइस प्रेसिडेंट पूनम सेवक के मुताबिक, इस मुहिम से लोगों को पीने के लिए शुद्ध और साफ पानी तो मिलता ही है, साथ ही महिलाओं को रोजगार भी मिल रहा है। इससे उनका जीवन स्तर सुधर रहा है। उनके बच्चों को अब बेहतर एजुकेशन मिल रही है।
जिन महिलाओं को पानी भरने के लिए कई किलोमीटर जाना होता था आज उनके गांव में ही साफ पानी मिल रहा है। कोरोना संक्रमण में भी यह एटीएम बंद नहीं हुआ। हर सेंटर पर सैनिटाइजर रखे गए थे, लोग लाइन में लगकर पानी भरते थे।
कैसे काम करता है वाटर एटीएम
इसके लिए लोकल सोर्स यानी गांव के आसपास के तालाब और नदियों से पानी लिया जाता है और उसे अलग-अलग लेवल पर प्यूरीफाई किया जाता है। कुल छह चरणों में पानी को साफ किया जाता है। इसके बाद उसे एटीएम मशीन में भरा जाता हैं। हर सेंटर पर इससे जुड़े कुछ लोग होते हैं, जो वाटर ट्रीटमेंट का काम करते हैं। उन्हें इसके लिए विशेष ट्रेनिंग दी गई है।
इतना ही नहीं गांव वालों को भी पानी के स्टोरेज और साफ सफाई के लिए जागरूक किया जाता है। कई जगहों पर उनसे पानी भी खरीदा जाता है, जिसे प्यूरीफाई कर शुद्ध पानी सप्लाई किया जाता है।
वर्ल्ड वाटर डेवलपमेंट रिपोर्ट 2019 के मुताबिक भारत में 10 करोड़ लोगों को पीने के लिए साफ पानी नहीं मिल पाता है। वहीं वर्ल्ड बैंक की रिपोर्ट के मुताबिक, देश में 21 फीसदी बीमारियां दूषित पानी की वजह से होती हैं।