बुधवार, 3 जून 2020

महाराष्ट्र-गुजरात तट से आज 110 किमी/घंटा की गति से टकराएगा तूफान; मुंबई में हाईअलर्ट, परमाणु-केमिकल यूनिट काे खतरा

अरब सागर से उठा डीप डिप्रेशन मंगलवार को चक्रवाती तूफान में बदल गया। इस तूफान का नाम निसर्ग है जो महाराष्ट्र और गुजरात के तटीय इलाकों की ओर बढ़ रहा है। चक्रवात मार्ग के अनुसार, बुधवार को यह भीषण रूप में रायगढ़ के हरिहरेश्वर और दमण के बीच अलीबाग के पास 110 किमी/घंटा की हवा की रफ्तार से टकरा सकता है। वहां से होते हुए उत्तर में मुंबई, पालघर से होते हुए दक्षिण गुजरात की ओर बढ़ेगा। मुंबई तो इस सदी के पहले बड़े तूफान की जद में आ रही है।

मौसम विभाग के साइक्लोन ई-एटलस के मुताबिक, 1891 के बाद पहली बार महाराष्ट्र के तटीय इलाके के आसपास साइक्लोन का खतरा मंडराया है। इससे पहले साल 1948 और 1980 में ऐसी स्थिति उत्पन्न तो हुई थी, लेकिन वो चक्रवात में बदल पाई थी। उधर, तूफान के असर सेबुधवार-गुरुवार काे मध्यप्रदेश के भोपाल, इंदौर समेतचार संभागों के ज्यादातर हिस्से में 2 से 4 इंच तक यानी 5 से 10 सेमी तक बारिश हाे सकती है।

परमाणु-केमिकल यूनिट काे खतरा
सीएम उद्धव ठाकरे ने कहा कि तूफान के मार्ग में रायगढ़ और पालघर में पड़ने वाले परमाणु और केमिकल संयंत्र भी हैं, जिसको लेकर चिंता जताई जा रही है। इससे बिजली बंद हो जाने का भी खतरा है। प्रधानमंत्री ने इस संबंध में उद्धव से बात भी की।

तैयारी: गुजरात-महाराष्ट्र में एनडीआरएफ की 34 टीमें

  • गुजरात के तटीय जिलाें में 80 हजार लोगों को सुरक्षित जगह पहुंचाया।
  • नौसेना ने मुंबई में 5 फ्लड रेस्क्यू टीम और 3 गोताखोर टीम तैनात की हैं।
  • पालघर जिले में सब बंद। मुंबई में मछुआरों ने नौकाएं हटाईं।
  • महाराष्ट्र के तटीय क्षेत्रों में धारा 144 लागू।

असर: मुंबई सहित दो राज्यों के 11 जिलों में रेड अलर्ट

  • गोवा में निसर्ग का असर, पणजी में भारी बारिश।
  • मुंबई में भी बारिश शुरू, बुधवार को 27 सेमी से ज्यादा बारिश संभव, समुद्र में दो मीटर ऊंची लहरें उठेंगी।
  • ऐहतियातन संभावित प्रभावित जिलों में बिजली-पानी की सप्लाई बंद हो रही है।

मध्यप्रदेश:4 संभागों में बारिश होगी, धार में 1 इंच पानी बरसा

तूफान के असर सेबुधवार-गुरुवार काे मध्यप्रदेश के चार संभागों के ज्यादातर हिस्से में 2 से 4 इंच तक यानी 5 से 10 सेमी तक बारिश हाे सकती है। माैसम वैज्ञानिकाें का कहना है कि भाेपाल, उज्जैन, इंदाैर, ग्वालियर-चंबल संभागाें के कुछ जिलाें व शहराें में भारी या अति भारी बारिश के आसार हैं। इनमें उज्जैन, इंदाैर, धार, बड़वानी, रतलाम, झाबुआ, हरदा, बैतूल, राजगढ़, सीहाेर, गुना, ग्वालियर, शिवपुरी, मुरैना, भिंड और श्याेपुर शामिल हैं।

वहीं, मंगलवार काे धार जिले के सरदारपुर में 25 मिमी यानी 1 इंच बारिश हाे गई। आलीराजपुर, धार जिले और देवास जिले के कई शहर व कस्बाें में 4 सेमी से ज्यादा बारिश हुई। राजधानी भाेपाल में बादल छाए रहे। इस वजह से दिन का तापमान सामान्य से 6 डिग्री नीचे 34.4 डिग्री पर पहुंच गया।

राजस्थान: 14 जिलों में 3 दिन भारी बारिश का अलर्ट

मौसम विभाग ने अगले तीन दिनों तक राजस्थान के 14 जिलों में कहीं-कहीं भारी बारिश की चेतावनी दी है। साथ ही कहा कि इस दौरान ज्यादातर इलाकों में आंधीभी जारी रहने की आशंका है। प्रदेश में अरब सागर से उठे चक्रवाती तूफान निसर्ग का भी असर दिख सकता है। इससे राज्य दक्षिणी पश्चिमी पर भी हाेगा, जिससे भारी से अति बारिश का अनुमान है।

वहीं, मंगलवार को प्रदेश में पारा भी पैरों पर आ गया। सिर्फ 40.1 डिग्री के साथ जैसलमेर प्रदेश में सबसे गर्म रहा। नौतपा के पहले दिन 50 डिग्री सेल्सियस का रिकॉर्ड बनाने वाले चूरू में नौतपा के आखिरी दिन तापमान सिर्फ 35.3 डिग्री सेल्सियस रहा। जयपुर में तापमान 37.4, अजमेर में 37 और काेटा में 39.5 डिग्री रहा।

देश में चार साल बाद मानसून के साथ तूफान
केरल में मानसून की दस्तक के साथ अरब सागर से उठा चक्रवाती तूफान निसर्ग अति तीव्र तूफान में बदलने वाला है। डाॅप्लर राडार इंचार्ज वेद प्रकाश ने बताया कि जून के पहले हफ्ते में जब धरती सूखी रहती है आयन ज्यादा मात्रा बनते हैं पानी बरसने पर ब्लीचिंग हाे जाती है, सतह से हट जाते हैं, इस कारण बिजली गिरने की आशंका बढ़ जाती है।



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तस्वीर गुजरात के पालीताणा की है। मंगलवार को शहर के हाउसिंग बोर्ड क्षेत्र में तेज गर्जना के साथ पेड़ पर बिजली गिरी और आग लग गई। शुक्र है कि किसी की जान नहीं गई।


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भारत के सख्त लॉकडाउन को संभ्रांतों ने तो सराहा, लेकिन अमीरों का लॉकडाउन से प्रेम गरीबों को महंगा पड़ रहा है

मैं किसी काम से भारत आया था, तभी प्रधानमंत्री मोदी ने लॉकडाउन की घोषणा की, जो दुनिया का सबसे सख्त लॉकडाउन माना गया। उन्होंने 18 दिन की महाभारत का आह्वान करते हुए कहा कि कोरोना के खिलाफ युद्ध जीतने में 21 दिन लगेंगे। दो महीने से भी ज्यादा वक्त हो चुका है और मैं यहीं फंसा हूं और दिल्ली स्थित अपने घर से बाहर नहीं जा पा रहा हूं।

मेरी पहली चिंता यह थी कि हमेशा की तरह भारत जन सुरक्षा व कल्याण के लिए अमीर देशों के उपायों की नकल कर रहा है। मैंने जब बड़े उभरते हुए देशों के अधिकारियों से बात की तो किसी ने भी संपूर्ण लॉकडाउन का समर्थन नहीं किया क्योंकि नए बेरोजगारों को संभालने के लिए संसाधनों के बिना अर्थव्यवस्था को बंद करने का नतीजा भूख और मौत होगा। कुछ ही दिनों में लाखों प्रवासी मजदूर देश के बड़े शहरों से निकलने लगे, हजारों तो मेरे दरवाजे के सामने से गुजरेे।

ज्यादातर युवा पुरुष थे, जिन्हें निर्माण कार्यों से या घबराए हुए मकान मालिकों ने निकाल दिया। उन्होंने अजनबियों की दया पर जीने की योजना बनाई और सैकड़ों किलोमीटर दूर, गावों में घर जाने के लिए पैदल चलते रहे। मुझे पूछना पड़ा कि सोशल डिस्टेंसिंग के बिना, इनमें से कितने घर पहुंच पाएंगे। एक युवा ने मुझसे कहा, ‘इससे फर्क नहीं पड़ता। सरकार कहती है कि गंभीर बीमारी है, इसलिए घर जाने के अलावा क्या कर सकते हैं?’
दिल्ली के उदारवादी संभ्रांत लंबे समय से मोदी की स्वेच्छाचारी शैली और हिन्दू-केंद्रित एजेंडा के आलोचक रहे हैं, लेकिन वे भी लॉकडाउन के लिए उनके पीछे चल पड़े। शुरुआत में सरकार ने कोरोना मरीजों को सरकारी अस्पतालों में भर्ती करने का निर्णय लिया, जिससे विशेषाधिकार प्राप्त लोग नर्क की तरह डरते हैं। एक दोस्त ने जब यह कहा कि ‘वायरस भले ही तुम्हें न मारे, सरकारी अस्पताल में तुम जरूर मर जाओगे।’ तो वह पूरी तरह मजाक नहीं कर रहा था।

तीन हफ्तों के बाद सरकार ढिलाई वाले लॉकडाउन लाने लगी, लेकिन उच्च-वर्गीय भारतीय रिलेक्स होने की जगह लॉकडाउन के जीवन को पसंद करना सीख रहे थे। उन्होंने नेटफ्लिक्स, जूम पार्टी और साफ आसमान व चांद के दृश्यों की तारीफें कीं। वे बंद पड़े चंडीगढ़ में घूमते चीते की तस्वीरें देख अचंभित होते रहे। वाह प्रकृति!
जब मैंने अपने लिविंग रूम की खिड़की से कम्यूनिटी स्टाफ के कमरों को देखा तो सोचा कि क्या 200 वर्ग फीट के कमरे में रह रहे 6 मजदूरों के लिए सोशल डिस्टेंसिंग के कोई मायने होंगे? भीड़ वाली परिस्थितियों में रहकर लॉकडाउन का कोई मतलब रह जाता है? इस बीच सामान्य दिनों में अभिमानी और संकट के समय ‘जरूरी’ भारतीय नौकरशाहों और पुलिस के लिए यह संकट जैसे खुली छूट का समय था।

वॉट्सऐप पर आए कई वीडियो में पुलिस सड़क पर लोगों को बिना संतोषजनक कारण के पीटती, सजा देती दिखी। अप्रैल मध्य तक कई अमीर देशों में अर्थव्यवस्थाएं फिर से खोलने पर बहस होने लगी। अमेरिका में लॉकडाउन विरोधी प्रदर्शन हो रहे थे। भारत में इसपर कम बहस थी और विरोध तो और भी कम।

सबसे ज्यादा प्रभावित गरीबों और बेरोजगारों ने अपनी दयनीय स्थिति को किस्मत मानकर स्वीकार कर लिया था। ऐसा लग रहा था कि देश इस बात से अंजान है कि ज्यादा सख्त लॉकडाउन से आर्थिक नुकसान भी ज्यादा हो रहा है।

कई देशों में महामारी मौत का सबसे बड़ा कारण बन गई है, वहीं भारत में अब भी हर हफ्ते टीबी या डायरिया जैसे रोगों से ज्यादा मौतें होती हैं, ज्यादातर ग्रामीण क्षेत्रों में। फिर भी शहरी संभ्रांत वर्ग पर राजनीति का प्रभाव रहा और वे सख्त लॉकडाउन का समर्थन करते रहे। मेरे एक दोस्त ने कहा, ‘अगर सरकार प्रतिबंध हटा देगी तो लाखों निरक्षर भारतीय सड़कों पर उतर आएंगे और बीमारी तेजी से फैलेगी।’
अनुमान है कि हर हफ्ते लॉकडाउन की वजह से लाखों भारतीय गरीबी रेखा के नीचे चले गए। इसपर संभ्रांत वर्ग का जवाब होता है, ‘सरकार को उनका ख्याल रखना चाहिए। देखो अमेरिका विस्थापित कामगारों पर कितना खर्च कर रही है।’ वे यह नहीं सोचते कि भारत में औसत आय अमेरिका की तुलना में केवल 8.3% है या किसी भी देश की ब्यूरोक्रेसी, जिसमें बहुत अमीर देश भी शामिल हैं, करोड़ों कामगारों के अचानक पलायन के लिए तैयार नहीं है।

अब विडंबना यह है कि भारत आजादी के बाद की सबसे बड़ी मंदी की ओर बढ़ रहा है और आर्थिक दबाव ने कोरोना मामले बढ़ने के बावजूद अनलॉक के लिए मजबूर किया है। घर लौटते और वहां जाकर पॉजिटिव आ रहे प्रवासियों की दुर्दशा को कोई नजरअंदाज नहीं कर सकता।

जब मैं यह लेख लिखने बैठा तो रात आधी से ज्यादा बीत चुकी थी। बाहर अचानक गुस्से में चीखने की आवाजें आईं। वह प्रवासियों का समूह था, जो पास की झुग्गी-झोपड़ी से आए चोरों के हमले से बचने की कोशिश कर रहा था। मैं आशा करता हूं वे सुरक्षित घर पहुंच गए होंगे। लेकिन लॉकडाउन वाली जिंदगी से प्यार? यह प्यार बहुत महंगा पड़ेगा।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)



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रुचिर शर्मा, ग्लोबल इन्वेस्टर, बेस्टसेलिंग राइटर अौर द न्यूयॉर्क टाइम्स के स्तंभकार


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नए लिफाफों पुरानी घोषणाएं: सरकार घोषणाओं के जरिए किसानों को जो ‘नई’ राहतें दे रही है, उनमें ज्यादातर पुरानी हैं

खबरों में बताया जाता है, ‘किसानों के लिए सरकार की सौगात’। साथ में अक्सर प्रधानमंत्री की तस्वीर और बड़े-बड़े आंकड़े होते हैं। कुछ दूसरी खबरें गुम हो जाती हैं। ‘सात दिन से फसल खरीदी के इंतजार में मंडी में खड़े किसान’। ‘चना और मकई की खरीद ना होने पर किसानों को भारी धक्का’। ‘गन्ना किसानों को नहीं मिला पिछले सीजन का बकाया’। ‘ओलावृष्टि के शिकार किसानों ने मांगा मुआवजा’।

हम भ्रम पालते हैं कि सरकार कर तो बहुत कुछ रही है, लेकिन किसान तक पूरा फायदा पहुंच नहीं रहा। इन बड़ी सरकारी घोषणाओं की सच्चाई जानने के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की नवीनतम घोषणा को लें। पिछले 3 साल से सरकार रबी व खरीफ की एमएसपी की घोषणा कुछ इस अंदाज में करती है मानो इतिहास में पहली बार किसान को एमएसपी दिया है। मूल्य में सालाना बढ़ोतरी ऐसे पेश होती है मानो पहले सालाना बढ़ोतरी नहीं होती थी। हर बार लागत का डेढ़ गुना दाम देने का दावा किया जाता है। सुनने वाले को लगता है कि किसान को बड़ा फायदा मिल गया है।
हकीकत यह है कि साल में दो बार एमएसपी की घोषणा की रस्म 50 साल से है। इससे किसान को क्या मिलता है यह खरीफ के मौसम की बड़ी फसल धान के उदाहरण से देख सकते हैं। इस साल सरकार ने धान का एमएसपी पिछले साल के रु.1815 प्रति कुंतल से बढ़ाकर रु.1868 घोषित किया है। कुल बढ़त हुई रु.51 यानी कि 2.9%। यह बढ़त पिछले साल की 3.7% की बढ़त से कम है।

पिछले 5 साल में इतनी कम सालाना बढ़ोतरी कभी नहीं हुई थी। यह बढ़ोतरी इस साल महंगाई की दर 6% से भी आधी है। यानी धान का मूल्य बढ़ा नहीं, कम हुआ। यही बात कमोबेश बाकी फसलों पर भी लागू होती है। खरीफ की जिन 14 फसलों का एमएसपी घोषित हुआ है उनमें से 12 में इस साल की बढ़ोतरी पिछले साल से कम है।

धान के साथ ज्वार, मूंगफली, सूरजमुखी, सोयाबीन की फसलों के लिए एमएसपी की सालाना बढ़ोतरी पिछले 5 साल में सबसे कम हुई है। किसान की लागत की तुलना में भी सरकार द्वारा घोषित मूल्य असंतोषजनक है। सरकार हर साल गाजे-बाजे के साथ घोषणा करती है कि स्वामीनाथन कमीशन की सिफारिश के अनुसार किसान को लागत का डेढ़ गुना दाम मिल गया है।

इसमें यह सच दब जाता है कि इस सरकार ने लागत की परिभाषा ही बदल दी है और डेढ़ गुना का दावा आंशिक लागत के आधार पर किया जा रहा है। अगर किसान की संपूर्ण लागत देखी जाए तो इस साल धान की लागत लगभग रु. 1700 प्रति क्विंटल बैठती है। उस हिसाब से सरकारी मूल्य रु. 1868 की बजाय रु. 2550 होना चाहिए था।

इस वास्तविक लागत पर किसान को अधिकांश फसल में मुश्किल से 10% से 20% की ही बचत होती है। और वह भी तब जब उसे बाजार में सरकारी भाव मिले। हकीकत यह है कि देश के आधे से कम राज्यों में सरकारी खरीद होती है, और वह भी सिर्फ गेहूं और धान की ही।
सरकार की दूसरी बड़ी घोषणा यह थी कि किसानों को फसल लोन रियायती ब्याज दर पर मिलेगा। लेकिन इस घोषणा में कुछ भी नया नहीं था। किसान क्रेडिट कार्ड पर फसल लोन की सुविधा लगभग 20 साल से चल रही है। समय पर भुगतान करने पर ब्याज में 3 प्रतिशत अतिरिक्त छूट का प्रावधान भी बहुत पुराना है।

इस साल सरकार ने 31 अगस्त तक भुगतान में देरी की छूट जरूर दे दी, लेकिन इस देरी के दौरान चक्रवर्ती ब्याज में कोई रियायत नहीं मिलेगी। यही हाल वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण जी द्वारा किसानों के लिए की गई बड़ी घोषणाओं का था। किसान सम्मान निधि की हर किस्त को सरकार ऐसे पेश करती है मानो कोई नया तोहफा दिया हो।

किसानों के लिए की गई घोषणाओं की लंबी फेहरिस्त में अधिकांश घोषणाएं वे थीं जिन्हें यही वित्त मंत्री फरवरी के बजट भाषण में घोषित कर चुकी थीं! यानी कि पुरानी शराब, पुरानी बोतल और लेबल भी पुराना, बस उसे एक नए लिफाफे में डालकर थमाया जा रहा था।

अर्थशास्त्रियों का ध्यान भरमाने के लिए वित्त मंत्री ने तीन दूरगामी नीतिगत घोषणाएं भी कर डालीं। आवश्यक वस्तुओं की जमाखोरी के विरुद्ध कानून ढीला होगा, कृषि मंडी के कानून में सुधार होगा और ठेके पर खेती को कानूनी मान्यता मिलेगी।

मजे की बात यह कि इनमें से एक भी सुधार ऐसा नहीं था, जिसकी मांग देश के किसान कर रहे हैं। इन तीनों ही नीतियों का कोरोना और लॉकडाउन के कारण किसान को हो रही परेशानी से दूर-दूर का वास्ता नहीं था।
पिछले सप्ताह वर्ष 2019-20 के जीडीपी के आंकड़े ने फिर याद दिलाया है कि जहां अर्थव्यवस्था के अधिकांश क्षेत्र मंदी का शिकार हुए हैं, वही कृषि ने 5.9% वृद्धि से अर्थव्यवस्था को बचाए रखा है। आज कोरोना का सामना करते हुए अगर देश सर उठा कर खड़ा है तो इसीलिए क्योंकि किसान की मेहनत से देश में पर्याप्त अन्न भंडार उपलब्ध है। अन्नदाता ने तो देश के लिए अपना काम कर दिया लेकिन क्या देश के कर्णधार भी अन्नदाता के लिए अपना काम करेंगे?

(ये लेखक के अपने विचार हैं)



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योगेंद्र यादव, सेफोलॉजिस्ट और अध्यक्ष, स्वराज इंडिया


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टिड्डी दल के हमले से देश के 38% बागवानी उत्पादन पर संकट गहराया, इससे प्रभावित 5 बड़े राज्यों के किसानों की रोजी-रोटी पर खतरा- रिपोर्ट

टिड्‌डी दल का हमला बागवानी के लिए बड़ा खतरा बनकर उभरा है। अगर मध्यप्रदेश, गुजरात, राजस्थान, महाराष्ट्र और उत्तरप्रदेश में बागवानी उत्पादन को सुरक्षित नहीं किया गया तो देश का कुल 38 प्रतिशत बागवानी उत्पादन प्रभावित हो जाएगा। वित्तीय सेवा प्रदाता कंपनी मोतीलाल ओसवाल फाइनेंशियल सर्विसेज की एक सेक्टर रिपोर्ट में यह अंदेशा जताया गया है।

रिपोर्ट के मुताबिक, रबी की फसल कटाई अप्रैल में शुरू होती है और मई में खत्म होती है। इस तरह, वर्तमान में हमले के जोखिम वाले क्षेत्र में प्रमुख फसलों की कटाई हो चुकी है। हालांकि, यदि हमले पर अंकुश नहीं लगाया जाता है, तो यह खरीफ उत्पादन के लिए जोखिम पैदा करेगा।

वहीं, बागवानी के साथ ऐसा नहीं है। राजस्थान, महाराष्ट्र, मप्र, यूपी और गुजरात में फल और सब्जियों की फसल पर बड़ा खतरा मंडरा रहा है। टिड्डी दल का हमला यूपी में गन्ने की फसल को प्रभावित कर सकता है। देश में कुल गन्ना उत्पादन में यूपी का हिस्सा 45% है।

क्लोरफाइरीफोस और मेलाथियान कीटनाशकों का इस्तेमाल करें

अगर खरीफ की फसल पर टिड्डी दल ज्यादा नुकसान पहुंचाते हैं तो किसानों की आय घटेगी। इससे एग्रो केमिकल कंपनियों का प्रदर्शन प्रभावित हो सकता है। रिपोर्ट के मुताबिक टिड्डियों को नियंत्रित करने के लिए कीटनाशकों में क्लोरफाइरीफोस, मेलाथियान और डेल्टामिथ्रिन का उपयोग किया जा सकता है।

जुलाई में मानसूनी हवाओं के साथ फिर लौट सकता है टिड्‌डी दल

रिपोर्ट के मुताबिक, टिड्डी दल से प्रभावित पांच प्रमुख राज्य 3.12 करोड़ टन बागवानी उत्पादन करते हैं। भारत की कुल बागवानी में इनका 38% का योगदान है। सब्जियों का उत्पादन 59% होता है। बागवानी उत्पादन का लगभग 31% फलों से आता है। गर्मियों के फलों में आम, तरबूज, नारंगी, कस्तूरी, मीठे नीबू, कटहल, काली बेर, लीची, अनानास, अंजीर और बर्फ सेब शामिल हैं।

विशेषज्ञोंं के मुताबिक, राजस्थान, उत्तर प्रदेश और मप्र में टिड्डी दल की जुलाई में मानसूनी हवाओं के साथ दोबारा वापसी होने की संभावना है।

  • 3.12 करोड़ टन बागवानी उत्पादन होता है टिड्डी प्रभावित राज्यों में
  • 59 फीसदी सब्जियों का हिस्सा है कुल उत्पादन में
  • 31 फीसदी फलों की है हिस्सेदारी


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राजस्थान, उत्तरप्रदेश और मप्र में टिड्डी दल की जुलाई में मानसूनी हवाओं के साथ दोबारा वापसी की संभावना।


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ट्विटर इंडिया के एमडी बोले- एक्टिव यूजर्स 24% बढ़े, ट्रोल और हेट स्पीच के 50% ट्‌वीट हम रिपोर्ट होने से पहले ही ब्लॉक कर देते हैं

लॉकडाउन के कारण लोगों का ऑन स्क्रीन टाइम बढ़ गया है। लोग सोशल मीडिया पर एक्टिव रहते हैं। देश में रेल सेवा शुरू होने की बात हो या हवाई सेवाएं, कई महत्वपूर्ण जानकारी ट्विटर से ही देश को मालूम पड़ीं। कोविड-19 के दौरान ट्विटर में नए फीचर जोड़ने, हेटस्पीच, ट्रोल आदि से जुड़े मामलों पर दैनिक भास्कर ने ट्विटर इंडिया के मैनेजिंग डायरेक्टर मनीष माहेश्वरी और डायरेक्टर पब्लिक पॉलिसी इंडिया एंड साउथ एशिया महिमा कौल से बात की। पेश है उनसे बातचीत के प्रमुख अंश...

महिमा कौल।

सवाल: क्या आपने कोविड-19 के दौरान ट्विटर पर बातचीत में कोई बदलाव देखा है?
ग्लोबली हमारे डेली एक्टिव यूजर्स (एमडीएयू) की संख्या 24% बढ़कर 16.6 करोड़ हो गई है। जो सीजनल मजबूती, चल रहे उत्पाद सुधारों और कोविड-19 महामारी से संबंधित ग्लोबल बातचीत के कारण हैं। यह हमारी डेली एक्टिव यूजर्स के मामले में अब तक की सर्वाधिक वार्षिक बढ़ोतरीहै। पिछली तिमाही के बाद से 1.4 करोड़ औसत डेली एक्टिव यूजर्स जुड़े हैं।
सवाल: कोविड-19 के बारे में भ्रामक जानकारी देने वालों के खिलाफ ट्विटर ने क्या कदम उठाए हैं?
हम नियमित रूप से स्वास्थ्य अधिकारी, रिसर्चर्स, एनजीओ और सरकार के साथ काम कर रहे हैं। हमने अपने सुरक्षा नियमों का विस्तार किया है ताकि ऐसे कंटेंट से निपटा जा सके, जिसका उद्देश्य आधिकारिक स्रोतों को गलत तरीके से पेश करना है। जैसे ‘सोशल डिस्टेंसिंग प्रभावशाली नहीं होती है आदि।

हम ऐसी सामग्री या कंटेंट पर प्रभावशाली कार्यवाही कर रहे हैं, जो हमारे ट्विटर नियमों का उल्लंघन करती है। इसमें अमानवीय भाषा भी शामिल है। इनमें से करीब आधे हम सूचना मिलने से पहले ही पकड़ लेते हैं। ट्विटर, डेवलपर लैब्स एक नया एंडपॉइन्ट जारी कर रहा है, ताकि डेवलपर्स और शोधकर्ता कोविड-19 के बारे में सार्वजनिक बातचीत का अध्ययन कर सकें।
सवाल: बीते दो माह में भ्रामक सूचना देने वाले कितने पोस्ट्स और ट्वीट हटाए गए हैं?
18 मार्च को हमने ग्लोबली अपडेट पॉलिसी जारी की है। इसके तहत 2400 ट्वीट्स को हटा चुके हैं। हमारे आटोमेटिड सिस्टम्स ने 34 लाख से अधिक कोविड-19 को प्रभावित करने वाले एकाउंट्स को चैलेंज किया है।
सवाल: ट्रोलिंग के बारे में ट्विटर का क्या कहना है?

ट्विटर की यह ताकत है कि हम एक खुली, सार्वजनिक और वास्तविक समय आधारित सेवा देते हैं। घृणित आचरण, प्लेटफॉर्म में हेरफेर और दुर्व्यवहार को रोकने की हमारी नीति है। नियमों का उल्लंघन करने वाले एकाउंट्स की पहचान कर कार्रवाई करते हैं। उनके स्रोत की जानकारी पहचान लेते हैं और उन्हें ब्लॉक भी कर देते हैं।
सवाल: कोविड-19 के मद्देनजर टि्वटर ने विश्वसनीय सूचना देने के लिए क्या कोई नया फीचर जोड़ा है?
टि्वटर ने तीन नई शुरुआत की है। कोविड-19 से जुड़ी गलत जानकारी से निपटने के लिए हम निर्णायक जवाब दे रहे हैं। हम एक अलग इंडिया-ओनली इवेंट्स पेज की शुरूआत कर रहे हैं। इसमें आईएफसीएन प्रमाणित नेटवर्क से लेटेस्ट फेक्ट और सत्यापित कोविड-19 कंटेंट होगा। इसके अलावा हमने अलग कोविड-19 सर्च प्रॉम्प्ट की शुरुआत की है।

यह राष्ट्रीय स्वास्थ्य एजेंसियों और डब्ल्यूएचओ से प्राप्त कंटेंट उपलब्ध कराता है। ‘कोरोनावायरस ट्वीट्स फ्रॉम इंडियन अथॉरिटीस’ नाम का यह पेज, सत्यापित केंद्रीय और राज्य सरकारों के मंत्रियों, अधिकारियों एवं विभागों और पब्लिक हेल्थ एजेंसियों के ट्वीट्स टाइमलाइन के हिसाब से एकसाथ रखते हैं। भारत में प्रत्येक एकाउंटधारक इस पेज को अपनी होम टाइमलाइन में टॉप पर देख सकता है।
सवाल: केंद्र-राज्य सरकार के साथ ट्विटर किस तरह काम कर रहा है?
हम कोविड रिस्पोंस मैनेजमेंट पर विभिन्न विभागों, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय, विभिन्न राज्य सरकारों के साथ काम कर रहे हैं। हमने अलग कोविड-रिस्पांस एकाउंट्स खातों को स्थापित करने के लिए कर्नाटक, महाराष्ट्र, झारखंड और उत्तर प्रदेश सरकार को भी सहयोग दिया है। स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय ने एक अलग एकाउंट एटदरेट कोविडइंडियासेवा भी शुरू किया है। जो सरकार द्वारा किए गए उपायों पर लेटेस्ट अपडेट, स्वास्थ्य सेवाओं तक कैसे पहुंचें या किसी ऐसे कोरोना संदिग्ध व्यक्ति के लिए जानकरी प्राप्त करना हो आदि के लिए यह सेवा जनता को सीधे अधिकारियों से जोड़ती है।



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ट्विटर इंडिया के एमडी मनीष माहेश्वरी।


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लॉकडाउन के बाद बढ़ी साइकिल की बिक्री; कई देशों में नई नीति, इटली में साइकिल खरीदने पर 60% खर्च सरकार दे रही

इटली के फ्लोरेंस में साइकिल और टू-व्हीलर बेचने वाली कंपनी प्रो-बाइक के मालिक एनरिको लेपोर इन दिनों बहुत हैरान हैं। तीन महीने पहले तक लगभग खाली रहे एनरिको अपनी दुकान के बाहर साइकिल खरीदने वालों की भीड़ देखकर भरोसा नहीं कर पा रहे हैं।

वे बताते हैं, ‘‘हमने दो महीने में ही पिछले साल की तुलना में दोगुनी साइकिलें बेच दी हैं। स्टॉक खत्म हो चुका है।’’

ऐसी ही स्थिति यूरोप, अमेरिका, स्विट्जरलैंड, ब्रिटेन, और डेनमार्क जैसे कई देशों में हैं। लॉकडाउन में पूरी तरह खाली सड़कों ने ऐसे लोगों को भी साइकिल का शौकीन बना दिया, जो इसे पसंद नहीं करते थे।

साइकिल की मांग के चलते कार चलाने वाले घटे

साइकिल की मांग के बीच कार चलाने वाले घट रहे हैं। न्यूयॉर्क में बाइक शेयरिंग सिस्टम 67% बढ़ा है। स्विट्जरलैंड में साइकिल बिक्री 171%, जबकि फिलाडेल्फिया में 151% बढ़ी है। टू-व्हीलर की वैश्विक राजधानी डेनमार्क में साइकिल बिक्री दो से तीन गुना बढ़ी है।

डेनमार्क मेंमेछले साल की तुलना में दोगुनी हुई बिक्री

कोपेनहेगन में ओमनियम बाइक्स के मालिक जेम्स रुबिन बताते हैं, ‘‘हम कारोबार के अब तक के सालों में सबसे व्यस्त समय गुजार रहे हैं। हमने अप्रैल-मई में ही 2019 में हुई बिक्री की तुलना में दोगुनी साइकिलें बेच दी हैं।’’

साइकिल कंपनियों के शेयर 15% बढ़े: दुनिया भर में साइकिलों की बिक्री बढ़ने और सरकारी नीतियों से साइकिल उद्योग को नई जिंदगी मिल गई है। एफटीएसई पर इन कंपनियों के शेयर दो महीने में 15% से ज्यादा चढ़े हैं। तीन महीने पहले तक संघर्ष कर रही साइकिल इंडस्ट्री को अब शायद सरकार से आर्थिक पैकेज की जरूरत भी नहीं होगी।

पेरिस में 650 किमी ट्रैक बनेगा, ब्रिटेन 18,000 करोड़ निवेश करेगा
कई देश नई ट्रांसपोर्ट नीति बना रहे हैं। इटली में 40 हजार रुपए तक की साइकिल खरीदने पर 60% खर्च सरकार दे रही है। फ्रांस पार्किंग पर 188 करोड़ खर्च करेगा, पेरिस में 650 किमी का ट्रैक बनेगा।

ब्रिटेन साइकिल इंफ्रा पर 18,000 करोड़ खर्च करेगा। अमेरिका के सिएटल में 32 किमी ट्रैक बना है। इटली के बोलोग्ना में 495 किमी साइकिल लेन बनेगी।



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कई देश साइकिल के इस्तेमाल को लेकर ट्रांसपोर्ट नीति बना रहे हैं। फ्रांस साइकिल पार्किंग पर 188 करोड़ खर्च करेगा, पेरिस में 650 किमी का ट्रैक बनेगा। - फाइल


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ट्विटर इंडिया के एमडी बोले- एक्टिव यूजर्स 24% बढ़े, ट्रोल और हेट स्पीच के 50% ट्‌वीट हम रिपोर्ट होने से पहले ही ब्लॉक कर देते हैं

लॉकडाउन के कारण लोगों का ऑन स्क्रीन टाइम बढ़ गया है। लोग सोशल मीडिया पर एक्टिव रहते हैं। देश में रेल सेवा शुरू होने की बात हो या हवाई सेवाएं, कई महत्वपूर्ण जानकारी ट्विटर से ही देश को मालूम पड़ीं। कोविड-19 के दौरान ट्विटर में नए फीचर जोड़ने, हेटस्पीच, ट्रोल आदि से जुड़े मामलों पर दैनिक भास्कर ने ट्विटर इंडिया के मैनेजिंग डायरेक्टर मनीष माहेश्वरी और डायरेक्टर पब्लिक पॉलिसी इंडिया एंड साउथ एशिया महिमा कौल से बात की। पेश है उनसे बातचीत के प्रमुख अंश...

महिमा कौल।

सवाल: क्या आपने कोविड-19 के दौरान ट्विटर पर बातचीत में कोई बदलाव देखा है?
ग्लोबली हमारे डेली एक्टिव यूजर्स (एमडीएयू) की संख्या 24% बढ़कर 16.6 करोड़ हो गई है। जो सीजनल मजबूती, चल रहे उत्पाद सुधारों और कोविड-19 महामारी से संबंधित ग्लोबल बातचीत के कारण हैं। यह हमारी डेली एक्टिव यूजर्स के मामले में अब तक की सर्वाधिक वार्षिक बढ़ोतरीहै। पिछली तिमाही के बाद से 1.4 करोड़ औसत डेली एक्टिव यूजर्स जुड़े हैं।
सवाल: कोविड-19 के बारे में भ्रामक जानकारी देने वालों के खिलाफ ट्विटर ने क्या कदम उठाए हैं?
हम नियमित रूप से स्वास्थ्य अधिकारी, रिसर्चर्स, एनजीओ और सरकार के साथ काम कर रहे हैं। हमने अपने सुरक्षा नियमों का विस्तार किया है ताकि ऐसे कंटेंट से निपटा जा सके, जिसका उद्देश्य आधिकारिक स्रोतों को गलत तरीके से पेश करना है। जैसे ‘सोशल डिस्टेंसिंग प्रभावशाली नहीं होती है आदि।

हम ऐसी सामग्री या कंटेंट पर प्रभावशाली कार्यवाही कर रहे हैं, जो हमारे ट्विटर नियमों का उल्लंघन करती है। इसमें अमानवीय भाषा भी शामिल है। इनमें से करीब आधे हम सूचना मिलने से पहले ही पकड़ लेते हैं। ट्विटर, डेवलपर लैब्स एक नया एंडपॉइन्ट जारी कर रहा है, ताकि डेवलपर्स और शोधकर्ता कोविड-19 के बारे में सार्वजनिक बातचीत का अध्ययन कर सकें।
सवाल: बीते दो माह में भ्रामक सूचना देने वाले कितने पोस्ट्स और ट्वीट हटाए गए हैं?
18 मार्च को हमने ग्लोबली अपडेट पॉलिसी जारी की है। इसके तहत 2400 ट्वीट्स को हटा चुके हैं। हमारे आटोमेटिड सिस्टम्स ने 34 लाख से अधिक कोविड-19 को प्रभावित करने वाले एकाउंट्स को चैलेंज किया है।
सवाल: ट्रोलिंग के बारे में ट्विटर का क्या कहना है?

ट्विटर की यह ताकत है कि हम एक खुली, सार्वजनिक और वास्तविक समय आधारित सेवा देते हैं। घृणित आचरण, प्लेटफॉर्म में हेरफेर और दुर्व्यवहार को रोकने की हमारी नीति है। नियमों का उल्लंघन करने वाले एकाउंट्स की पहचान कर कार्रवाई करते हैं। उनके स्रोत की जानकारी पहचान लेते हैं और उन्हें ब्लॉक भी कर देते हैं।
सवाल: कोविड-19 के मद्देनजर टि्वटर ने विश्वसनीय सूचना देने के लिए क्या कोई नया फीचर जोड़ा है?
टि्वटर ने तीन नई शुरुआत की है। कोविड-19 से जुड़ी गलत जानकारी से निपटने के लिए हम निर्णायक जवाब दे रहे हैं। हम एक अलग इंडिया-ओनली इवेंट्स पेज की शुरूआत कर रहे हैं। इसमें आईएफसीएन प्रमाणित नेटवर्क से लेटेस्ट फेक्ट और सत्यापित कोविड-19 कंटेंट होगा। इसके अलावा हमने अलग कोविड-19 सर्च प्रॉम्प्ट की शुरुआत की है।

यह राष्ट्रीय स्वास्थ्य एजेंसियों और डब्ल्यूएचओ से प्राप्त कंटेंट उपलब्ध कराता है। ‘कोरोनावायरस ट्वीट्स फ्रॉम इंडियन अथॉरिटीस’ नाम का यह पेज, सत्यापित केंद्रीय और राज्य सरकारों के मंत्रियों, अधिकारियों एवं विभागों और पब्लिक हेल्थ एजेंसियों के ट्वीट्स टाइमलाइन के हिसाब से एकसाथ रखते हैं। भारत में प्रत्येक एकाउंटधारक इस पेज को अपनी होम टाइमलाइन में टॉप पर देख सकता है।
सवाल: केंद्र-राज्य सरकार के साथ ट्विटर किस तरह काम कर रहा है?
हम कोविड रिस्पोंस मैनेजमेंट पर विभिन्न विभागों, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय, विभिन्न राज्य सरकारों के साथ काम कर रहे हैं। हमने अलग कोविड-रिस्पांस एकाउंट्स खातों को स्थापित करने के लिए कर्नाटक, महाराष्ट्र, झारखंड और उत्तर प्रदेश सरकार को भी सहयोग दिया है। स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय ने एक अलग एकाउंट एटदरेट कोविडइंडियासेवा भी शुरू किया है। जो सरकार द्वारा किए गए उपायों पर लेटेस्ट अपडेट, स्वास्थ्य सेवाओं तक कैसे पहुंचें या किसी ऐसे कोरोना संदिग्ध व्यक्ति के लिए जानकरी प्राप्त करना हो आदि के लिए यह सेवा जनता को सीधे अधिकारियों से जोड़ती है।



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ट्विटर इंडिया के एमडी मनीष माहेश्वरी।


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महाराष्ट्र-गुजरात तट से आज 110 किमी/घंटा की गति से टकराएगा तूफान; मुंबई में हाईअलर्ट, परमाणु-केमिकल यूनिट काे खतरा

अरब सागर से उठा डीप डिप्रेशन मंगलवार को चक्रवाती तूफान में बदल गया। इस तूफान का नाम निसर्ग है जो महाराष्ट्र और गुजरात के तटीय इलाकों की ओर बढ़ रहा है। चक्रवात मार्ग के अनुसार, बुधवार को यह भीषण रूप में रायगढ़ के हरिहरेश्वर और दमण के बीच अलीबाग के पास 110 किमी/घंटा की हवा की रफ्तार से टकरा सकता है। वहां से होते हुए उत्तर में मुंबई, पालघर से होते हुए दक्षिण गुजरात की ओर बढ़ेगा। मुंबई तो इस सदी के पहले बड़े तूफान की जद में आ रही है।

मौसम विभाग के साइक्लोन ई-एटलस के मुताबिक, 1891 के बाद पहली बार महाराष्ट्र के तटीय इलाके के आसपास साइक्लोन का खतरा मंडराया है। इससे पहले साल 1948 और 1980 में ऐसी स्थिति उत्पन्न तो हुई थी, लेकिन वो चक्रवात में बदल पाई थी। उधर, तूफान के असर सेबुधवार-गुरुवार काे मध्यप्रदेश के भोपाल, इंदौर समेतचार संभागों के ज्यादातर हिस्से में 2 से 4 इंच तक यानी 5 से 10 सेमी तक बारिश हाे सकती है।

परमाणु-केमिकल यूनिट काे खतरा
सीएम उद्धव ठाकरे ने कहा कि तूफान के मार्ग में रायगढ़ और पालघर में पड़ने वाले परमाणु और केमिकल संयंत्र भी हैं, जिसको लेकर चिंता जताई जा रही है। इससे बिजली बंद हो जाने का भी खतरा है। प्रधानमंत्री ने इस संबंध में उद्धव से बात भी की।

तैयारी: गुजरात-महाराष्ट्र में एनडीआरएफ की 34 टीमें

  • गुजरात के तटीय जिलाें में 80 हजार लोगों को सुरक्षित जगह पहुंचाया।
  • नौसेना ने मुंबई में 5 फ्लड रेस्क्यू टीम और 3 गोताखोर टीम तैनात की हैं।
  • पालघर जिले में सब बंद। मुंबई में मछुआरों ने नौकाएं हटाईं।
  • महाराष्ट्र के तटीय क्षेत्रों में धारा 144 लागू।

असर: मुंबई सहित दो राज्यों के 11 जिलों में रेड अलर्ट

  • गोवा में निसर्ग का असर, पणजी में भारी बारिश।
  • मुंबई में भी बारिश शुरू, बुधवार को 27 सेमी से ज्यादा बारिश संभव, समुद्र में दो मीटर ऊंची लहरें उठेंगी।
  • ऐहतियातन संभावित प्रभावित जिलों में बिजली-पानी की सप्लाई बंद हो रही है।

मध्यप्रदेश:4 संभागों में बारिश होगी, धार में 1 इंच पानी बरसा

तूफान के असर सेबुधवार-गुरुवार काे मध्यप्रदेश के चार संभागों के ज्यादातर हिस्से में 2 से 4 इंच तक यानी 5 से 10 सेमी तक बारिश हाे सकती है। माैसम वैज्ञानिकाें का कहना है कि भाेपाल, उज्जैन, इंदाैर, ग्वालियर-चंबल संभागाें के कुछ जिलाें व शहराें में भारी या अति भारी बारिश के आसार हैं। इनमें उज्जैन, इंदाैर, धार, बड़वानी, रतलाम, झाबुआ, हरदा, बैतूल, राजगढ़, सीहाेर, गुना, ग्वालियर, शिवपुरी, मुरैना, भिंड और श्याेपुर शामिल हैं।

वहीं, मंगलवार काे धार जिले के सरदारपुर में 25 मिमी यानी 1 इंच बारिश हाे गई। आलीराजपुर, धार जिले और देवास जिले के कई शहर व कस्बाें में 4 सेमी से ज्यादा बारिश हुई। राजधानी भाेपाल में बादल छाए रहे। इस वजह से दिन का तापमान सामान्य से 6 डिग्री नीचे 34.4 डिग्री पर पहुंच गया।

राजस्थान: 14 जिलों में 3 दिन भारी बारिश का अलर्ट

मौसम विभाग ने अगले तीन दिनों तक राजस्थान के 14 जिलों में कहीं-कहीं भारी बारिश की चेतावनी दी है। साथ ही कहा कि इस दौरान ज्यादातर इलाकों में आंधीभी जारी रहने की आशंका है। प्रदेश में अरब सागर से उठे चक्रवाती तूफान निसर्ग का भी असर दिख सकता है। इससे राज्य दक्षिणी पश्चिमी पर भी हाेगा, जिससे भारी से अति बारिश का अनुमान है।

वहीं, मंगलवार को प्रदेश में पारा भी पैरों पर आ गया। सिर्फ 40.1 डिग्री के साथ जैसलमेर प्रदेश में सबसे गर्म रहा। नौतपा के पहले दिन 50 डिग्री सेल्सियस का रिकॉर्ड बनाने वाले चूरू में नौतपा के आखिरी दिन तापमान सिर्फ 35.3 डिग्री सेल्सियस रहा। जयपुर में तापमान 37.4, अजमेर में 37 और काेटा में 39.5 डिग्री रहा।

देश में चार साल बाद मानसून के साथ तूफान
केरल में मानसून की दस्तक के साथ अरब सागर से उठा चक्रवाती तूफान निसर्ग अति तीव्र तूफान में बदलने वाला है। डाॅप्लर राडार इंचार्ज वेद प्रकाश ने बताया कि जून के पहले हफ्ते में जब धरती सूखी रहती है आयन ज्यादा मात्रा बनते हैं पानी बरसने पर ब्लीचिंग हाे जाती है, सतह से हट जाते हैं, इस कारण बिजली गिरने की आशंका बढ़ जाती है।



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तस्वीर गुजरात के पालीताणा की है। मंगलवार को शहर के हाउसिंग बोर्ड क्षेत्र में तेज गर्जना के साथ पेड़ पर बिजली गिरी और आग लग गई। शुक्र है कि किसी की जान नहीं गई।


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टिड्डी दल के हमले से देश के 38% बागवानी उत्पादन पर संकट गहराया, इससे प्रभावित 5 बड़े राज्यों के किसानों की रोजी-रोटी पर खतरा- रिपोर्ट

टिड्‌डी दल का हमला बागवानी के लिए बड़ा खतरा बनकर उभरा है। अगर मध्यप्रदेश, गुजरात, राजस्थान, महाराष्ट्र और उत्तरप्रदेश में बागवानी उत्पादन को सुरक्षित नहीं किया गया तो देश का कुल 38 प्रतिशत बागवानी उत्पादन प्रभावित हो जाएगा। वित्तीय सेवा प्रदाता कंपनी मोतीलाल ओसवाल फाइनेंशियल सर्विसेज की एक सेक्टर रिपोर्ट में यह अंदेशा जताया गया है।

रिपोर्ट के मुताबिक, रबी की फसल कटाई अप्रैल में शुरू होती है और मई में खत्म होती है। इस तरह, वर्तमान में हमले के जोखिम वाले क्षेत्र में प्रमुख फसलों की कटाई हो चुकी है। हालांकि, यदि हमले पर अंकुश नहीं लगाया जाता है, तो यह खरीफ उत्पादन के लिए जोखिम पैदा करेगा।

वहीं, बागवानी के साथ ऐसा नहीं है। राजस्थान, महाराष्ट्र, मप्र, यूपी और गुजरात में फल और सब्जियों की फसल पर बड़ा खतरा मंडरा रहा है। टिड्डी दल का हमला यूपी में गन्ने की फसल को प्रभावित कर सकता है। देश में कुल गन्ना उत्पादन में यूपी का हिस्सा 45% है।

क्लोरफाइरीफोस और मेलाथियान कीटनाशकों का इस्तेमाल करें

अगर खरीफ की फसल पर टिड्डी दल ज्यादा नुकसान पहुंचाते हैं तो किसानों की आय घटेगी। इससे एग्रो केमिकल कंपनियों का प्रदर्शन प्रभावित हो सकता है। रिपोर्ट के मुताबिक टिड्डियों को नियंत्रित करने के लिए कीटनाशकों में क्लोरफाइरीफोस, मेलाथियान और डेल्टामिथ्रिन का उपयोग किया जा सकता है।

जुलाई में मानसूनी हवाओं के साथ फिर लौट सकता है टिड्‌डी दल

रिपोर्ट के मुताबिक, टिड्डी दल से प्रभावित पांच प्रमुख राज्य 3.12 करोड़ टन बागवानी उत्पादन करते हैं। भारत की कुल बागवानी में इनका 38% का योगदान है। सब्जियों का उत्पादन 59% होता है। बागवानी उत्पादन का लगभग 31% फलों से आता है। गर्मियों के फलों में आम, तरबूज, नारंगी, कस्तूरी, मीठे नीबू, कटहल, काली बेर, लीची, अनानास, अंजीर और बर्फ सेब शामिल हैं।

विशेषज्ञोंं के मुताबिक, राजस्थान, उत्तर प्रदेश और मप्र में टिड्डी दल की जुलाई में मानसूनी हवाओं के साथ दोबारा वापसी होने की संभावना है।

  • 3.12 करोड़ टन बागवानी उत्पादन होता है टिड्डी प्रभावित राज्यों में
  • 59 फीसदी सब्जियों का हिस्सा है कुल उत्पादन में
  • 31 फीसदी फलों की है हिस्सेदारी


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राजस्थान, उत्तरप्रदेश और मप्र में टिड्डी दल की जुलाई में मानसूनी हवाओं के साथ दोबारा वापसी की संभावना।


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मंगलवार, 2 जून 2020

रिजर्व रहते थे अमिताभ, आयुष्मान सबसे घुलते-मिलते थे; बिग बी के मेकअप में लगते थे छह घंटे

12 जून को अमिताभ बच्चन औरआयुष्मान खुराना की फिल्म गुलाबो-सिताबो वेब प्लेटफार्मपर रिलीज हो रही है। इसकी शूटिंग लखनऊ के हजरतगंज और उसके आसपास संकरी गलियों में हुई है। अमिताभ ने फिल्म में मिर्जा का किरदार निभाया है। उनका गेटअप ऐसा था कि, शूटिंग के दौरान हजरतगंज में लोग उन्हें पहचान भी नहीं पाते थे। उन्हें ये मेकअप लगाने व उतारने में छह घंटे लगते थे। इस फिल्म में लखनऊ की वरिष्ठ कलाकार अर्चना शुक्ला ने आयुष्मान कीमां का रोल निभाया है। उन्होंने दैनिक भास्कर से बातचीत में फिल्म से जुड़े कुछ किस्से शेयर किए। जैसा उन्होंने बताया वैसा ही लिखा गया है...

पहला किस्सा: अमिताभको मेकअप लगाने और उतारने में लगते थे6 घंटे

अर्चना बताती हैं- "पिछले साल जून में इस शूटिंग शुरू हुई थी और लगभग 50 से 60 दिन का शूट चला था। इस पूरी फिल्म में अमिताभएक खड़ूस बुजुर्ग के रूप में नजर आए हैं। उनका पूरा लुक बदल दिया गया था। इस लुक को देने के लिए विदेश से एक लेडी मेकअप गर्लको भी बुलाया गया था, जो हमेशा अमिताभ के साथ सेट पर रहती थी। उनको मेकअप करने में 3 घंटे और उतारने में भी इतना ही समय लगता था। इसके लिए अमिताभ 3 घंटे पहले सेट पर आते थे।"

"कभी-कभी सेट पर कॉमिक होकर अपनी मेकअप लेडी से अमिताभबोलते थे कि कोई मेरी नाक नहीं छू सकता है और यह मेरी नाक सुबह शाम पकड़ती है। जिस पर सभी हंसते थे। मैं सही बताऊं तो अमिताभ के साथ मेरा सीन भी है। लेकिन, सीन के बाद उनसे कोई बात नहीं हुई। वह बहुत रिजर्व रहते थे। सबसे बड़ी बात जहां सबसे ज्यादा मेकअप बच्चन साहब का होता था वहीं, बाकी कलाकारों का एकदम न के बराबर मेकअप होता था। चूंकि, हम लोगों का रोल भी कुछ ऐसा था कि बहुत मेकअप की जरूरत नहीं थी।"

आयुष्मान खुराना के साथ अर्चना शुक्ला।

दूसरा किस्सा: पहले ही दिन लीक हुआ था खड़ूस बुजुर्ग बने अमिताभ का लुक

"पहले दिन वह जब सेट पर आए तो उनके आगे पीछे 10 तगड़े बाउंसर थे। मुझे याद है वह पहले दिन लुक टेस्ट के लिए आए थे। मेकअप के बाद वह कुर्सी डालकर वैनिटी के बाहर बैठे थे। उस दिन के बाद ही उनकी फोटोज वायरल हुई थी। इसके बाद उन्होंने सेट पर वैनिटी के बाहर बैठना ही छोड़ दिया। दरअसल, डायरेक्टर ने शूट से पहले ही हमें फिल्म की कहानी और फोटोज वीडियो लीक न करने की सलाह दी थी। जिसको हम सब फॉलो कर रहे थे, लेकिन बच्चन साहब की फोटो लीक हो गई। बाद में पता चला कि सेट पर कुछ लोकल फोटोग्राफर भी थे, जिन्होंने फोटो लीक की थी। हालांकि, बाद में अमिताभके ट्विटर हैंडल से भी फोटो ट्वीट हुई थी।"

अर्चना शुक्ला।

तीसरा किस्सा: अमिताभ के साथ फोटो खिंचाने के लिए 3 से 4 घंटेइंतजार

"अमिताभ बच्चन से मेरी मिलने की ख्वाहिश थी। लेकिन,कभी सोचा नहीं था कि उनके साथ काम करूंगी। गुलाबो-सिताबो की लगभग 50 से 60 दिन का शूट में सीन के अलावा अमिताभ से कोई बात नहीं हुई। हालांकि, हम जो लोकल कलाकार थे, वह अपनी यादों के लिए बच्चन साहब और आयुष्मान के साथ फोटो खिंचाना चाहते थे। तय हुआ कि जब शूट का आखिरी दिन होगा तो उस दिन ग्रुप फोटो होगी। चूंकि, हमारी शूट पैकअप से दो दिन पहले खत्म हो गईथी।"

"आखिरी दिन हम लोग जो लोकल कलाकार थे, सब सुबह 8 बजे तक पहुंच गए। उस दिन शहर में दो जगह शूट था तो बच्चन साहब दूसरी लोकेशन पर शूट कर हम जिस लोकेशन पर थे वहां वापस आए फिर वहां शूट शुरू हुआ। शूट खत्म होने के बाद वह वैनिटी टीम में आ गए। हम लोगों ने प्रोडक्शन मैनेजर से कहा कि हम लोगों की अमिताभ के साथ फोटो खिंचवा दे तो उसने कहा वह वैनिटी से निकलें तो आप लोग पकड़ लीजिएगा। मैं इसमें कोई मदद नहीं कर सकता। बहरहाल, मेकअप वगैरह उतारने के बाद जब वह वैनिटी वैन से बाहर आए तो उन्हें तुरंत हम लोगों ने घेर लिया और तड़ातड़ फोटो खींच डाली। जब तक वह कुछ समझते, तब तक हमारा काम हो चुका था। बहरहाल, वह मुस्कुराए और आगे निकल गए।"

अर्चना ने अमिताभ के साथ अचानक फोटो खींची।

चौथा किस्सा: जब फैन का मैसेज सुन परेशान हो गए थे आयुष्मान

"फिल्म में मैं आयुष्मान की मां बनी हूं तो कभी कभी ब्रेक में भी हमारी जो फिल्म में फैमिली है, सब इकट्ठे बैठते थे। इसी दौरान मेरा एक जानने वाला लड़का है, जो कि आरजे है। उसने जब जाना कि मैं आयुष्मान के साथ काम कर रही हूं तो उसने कहा मेरा मैसेज उन तक पहुंचा दीजिए कि मैं आयुष्मान का बहुत बड़ा फैन हूं। मैं उनके लिए कुछ भी कर सकता हूं। यहां तक कि मैं अपनी जान भी दे सकता हूं। जब ये बात मैंने आयुष्मान को बताई तो वह बहुत परेशान हो गया। उसने कहा कि उस लड़के से आप बोलो ऐसा वैसा कुछ न करे। मैं भी बिल्कुल वैसा ही हूं जैसा वह है। मेरे में कुछ खास नहीं है। वह अपना काम कर रहा है और मैं अपना काम कर रहा हूं।

आयुष्मान बहुत ही डाउन टू अर्थ लड़का है। ब्रेक में भी हमसे अपने परिवार की बातें किया करता था। हमारे बारे में सब कुछ जानना चाहता था। ऐसा नहीं है कि वह सिर्फ हमसे ही बात करता वह अन्य कलाकारों से भी बात करता था। वह सबसे सेट पर मजाक वगैरह किया करता था। एक बार मुझे सोने की एक्टिंग करनी थी तो मेरी तबियत खराब थी तो मैं लेटी और मैं खर्राटे लेने लगी। जिसकी आयुष्मान समेत सभी लोगों ने खूब तारीफ की।"

फिल्म के बाल कलाकारों के साथ अर्चना शुक्ला।

पांचवांकिस्सा: बच्चन साहब को कोई पहचान नहीं पाता था

"अमिताभ और आयुष्मान को लेकर लखनऊ में आउटडोर शूट करना बड़ा मुश्किल काम था। इसलिए आउटडोर शूट पर भारी सुरक्षा रहती थी। दोनों तरफ की रोड को ब्लॉक कर दिया जाता था। अगर वहां पब्लिक होती भी तो अमूमन मेकअप की वजह से बच्चन साहब को कोई जल्दी पहचान भी नहीं पाता था। अगर किसी वजह से भीड़ इकट्ठा भी होती थी तो उनके बाउंसर्स तुरंत उनके पास पहुंच कर घेर लिया करते थे।"



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ये तस्वीर लखनऊ में फिल्म गुलाबो सिताबो की शूटिंग के दौरान की है। अमिताभ बच्चन इस किरदार में हजरतगंज में घूमते थे, लेकिन उन्हें कोई पहचान नहीं पाता था। उन्हें इस गेटअप में आने के लिए तीन घंटे लगते थे। इसके बाद तीन घंटे मेकअप उतारने में समय लगता था।


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वायरस से उबरने के बाद महीनों तक भारी थकान और सांस की तकलीफ हो सकती है: ब्रिटेन की सबसे बड़ी एजेंसी की चेतावनी

कोरोना के मरीजों में कई महीनों तक अधिक थकान और सांस लेने की तकलीफ रह सकती है। यह अलर्ट ब्रिटेन की सबसे बड़ी सरकारी स्वास्थ्य एजेंसी नेशनल हेल्थ सर्विस (एनएचएस) ने कोरोना मरीजों के लिए जारी किया है।

एनएचएस के वैज्ञानिकों का कहना है कि कोरोनावायरस का असर शरीर पर लम्बे समय तक रह सकता है। कोरोना से उबरने के बाद शरीर पर इसका बुरा असर कब तक रहेगा, फिलहाल इस पर रिसर्च की जा रही है।

सामान्य जीवन में नहीं लौट सकेंगे
मई में एनएचएस के वैज्ञानिकों ने कोरोना के गंभीर लक्षणों पर चर्चा की थी जिसमें स्ट्रोक, किडनी डिसीज और अंगों की घटती कार्यक्षमता पर बैठक चली थी।

बैठक में एनएचएस के वैज्ञानिकों का कहना था कि कोरोना के उबरने वाले ऐसे मरीजों की संख्या अधिक होगी जो वापस सामान्य जीवन में नहीं लौट सकेंगे।

यह मॉडल पूरे देश में लागू होगा
खासतौर पर कोरोना पीड़ितों के लिए बनाए गए एनएचएस हॉस्पिटल में पिछले सप्ताह, ऐसे मरीज रिकवर हुए जो इलाज के बाद लम्बे समय से कोरोना के असर से जूझ रहे थे।

एजेंसी का कहना है, यही मॉडल देश में अब कोरोना से उबरने वाले मरीजों के लिए अपनाया जाएगा ताकि उनकी मेंटल डिसऑर्डर, सांस लेने में तकलीफ और हृदय रोगों के कॉम्पिकेशन से लड़ने में मदद की जा सके

पिछले हफ्ते भी दी थी चेतावनी
एनएचएस ने पिछले हफ्ते एक अलर्ट जारी करते हुए कहा था कि जिन लोगों के शरीर में किसी तरह का डैमेज हुआ है उन्हें रिकवर करने में हम मदद करेंगे।

एनएचएस के चीफ एग्जीक्यूटिव सिमोन स्टीवेंस का कहना है, हमारा देश महामारी की चरम स्थिति से गुजर रहा है, अब हमें इससे उबरने के बाद दिखने वाले परिणामों से बचाव के तरीकों पर काम करने की जरूरत है।

कोरोना को हराने के बाद ऐसे ट्रीटमेंट की जरूरत पड़ेगी
सिमोन स्टीवेंस के मुताबिक, कोरोना से उबरने वाले मरीजों को ट्रैकियोस्टॉमी वाउंड, हृदय और फेफड़ों के डैमेज रिपेयर करने वाली थैरेपी, मसल और सायकोलॉजिकल ट्रीटमेंट की जरूरत पड़ सकती है।

वहीं, कुछ ऐसे मरीज भी हो सकते हैं जिन्हें सोशल सपोर्ट की जरूरत होगी। इसके लिए हमें तैयार रहने की जरूरत है।



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Coronavirus patients can suffer 'extreme tiredness and shortness of breath for months'


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ईरान का आरत 9 माह की उम्र से मेहनत कर रहा, अब मेसी की तरह खेलने का सपना

6 साल की उम्र में सिक्स पैक एब बनाने वाले आरतहोसैनी की खूबियां हैं। ये इंस्टाग्राम स्टार और सॉकर प्लेयर होने के साथ जिम्नास्ट भी हैं। इन्हें अक्सर लोग लड़कीसमझ बैठते हैं। ईरान के बाबोल शहर में रहने वाले आरतअपने सिक्स पैक एब और सॉकर के कारण सोशल मीडिया स्टार बन चुके हैं। जानिए छोटी सी उम्र इतना नाम कमाने वाले लिटिल चैम्पियन की कहानी...

सॉकर प्लेयर को बॉडी ने बनाया स्टार : आरत के पिता मोहम्मद ने इनकी ट्रेनिंग काफी कम उम्र में ही शुरू कर की थी। आरत ने 9 माह की उम्र से जिम्नास्टिक करना शुरू किया और दो साल की उम्र पूरी होने तक अंतरराष्ट्रीय मीडिया की सुर्खियां बन चुका था। आरत को सॉकर खेलना काफी पसंद है लेकिन वे चर्चा में अपनी बॉडी के कारण आए।
सोशल मीडिया स्टार :आरत का जन्म इंग्लैंड के लिवरपूल में हुआ था, अब वह लिवरपूल एकेडमी में स्पोर्ट्स ट्रेनिंग ले रहे हैं। सोशल मीडिया पर अरत की फैन फॉलोइंग काफी बड़ी है। सिर्फ इंस्टाग्राम पर इनके 4 मिलियन फॉलोवर हैं। इनकी लगभग हर एक पोस्ट पर मिलियन लाइक हैं।

इंस्टाग्राम पर डेब्यू:आरत के पिता का कहना है कि बेटे में अनोखे टैलेंट को देखने के बाद आसपास के लोगों ने सलाह दी कि इंस्टाग्राम पर उसका एक पेज बनाना चाहिए। पेज बनने के बाद तेजी से लोगों ने उसे पसंद किया और लाखों फॉलोवर जुड़ गए।

आरोपों का सामना किया :अरत के पिता पर कई बार यह आरोप भी लगे कि वह अपने बेटे से पैसे कमाने के लिए ऐसा करा रहे हैं। जिसका उन्होंने जवाब दिया, उनका कहना है कि बेटा हमेशा से एथलेटिक्स एक्टिविटीज में एक्टिव रहा है। मैंने सिर्फ एक पिता के तौर पर उसकी उन चीजों में मदद की है जो वह करना चाहता है।

लिओनल मेसी के फैन :आरत दीवार पर चढ़ने की कला में भी माहिर हैं। अब उनका सपना है कि बड़े होकर बार्सिलोना सॉकर क्लब के लिए खेलें। उनके पसंदीदा खिलाड़ियों में लिओनल मेसी शामिल हैं, और आरत मेसी की तरह की खेलना चाहते हैं। फोटो साभार: इंस्टाग्राम



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6-Year-Old Instagram Sensation Stuns Internet With His Chiseled Physique


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लद्दाख में चीन के रवैये का अनुमान तभी लग जाना था जब जम्मू-कश्मीर में बदलाव किए गए थे

आजादी के बाद से अब तक अगर हम चीन के साथ संबंध देखें तो ऐसा क्या है कि जिसके आधार पर हम उसे रहस्यमय मानेंगे? 1962 में उसने दो मोर्चों पर हम पर जो हमला किया वह हमारे नेताओं के लिए चौंकाने वाला रहा होगा, लेकिन ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि वे भ्रम के शिकार थे।

उसके बाद से 1965 में पाकिस्तान के साथ हमारी 22 दिन की जंग में चीन की ‘उनके चुराए गए याक और भेड़ें लौटा दो’ की धमकी से लेकर इस साल लद्दाख सीमा पर उसकी तथाकथित ‘चौंकाने वाली’ हरकतों तक, भारत के मामले में चीन का हर कदम यही बताता है कि वह रहस्यमय तो बिल्कुल नहीं रहा है, बल्कि उसके हर कदम का पहले से अनुमान लगाया जा सकता है।

नाथु ला (सिक्किम) में 1967 में की गई चोट शायद भारत की प्रतिक्रिया देखने के लिए की गई थी। तब उसे लग रहा था कि 1962 और 1965 की लड़ाई, अकालों, अनाज के लिए विदेशी मदद पर निर्भर रहने, राजनीतिक अस्थिरता और इंदिरा गांधी का कद घटने से भारत अस्थिर हो गया होगा।

लेकिन भारत ने जो जवाब दिया, उससे उसने सबक सीखा और 53 वर्षों तक शांत रहा। क्या इसे चीन के रहस्यमय होने का सबूत मानेंगे? नहीं। उसने हमारी जांच-पड़ताल की और उसे करारा जवाब मिला।

फिर अलग-अलग समय पर विभिन्न तरीकों से गतिविधि करते हुए वह इंतज़ार करता रहा। 1960 के आसपास से अब तक के छह दशकों में चीन भारत के साथ रिश्तों को मर्जी से चलाता रहा है। उसने 1962 तक वो हासिल कर लिया था, जो चाहता था।

सच्चाई यह है कि लद्दाख में सामरिक रूप से जरूरी कुछ छोटे-छोटे टुकड़ों को छोड़कर, उसने लगभग पूरा कब्जा कर लिया था। उसने पूरी तरह से भारत के नियंत्रण में रहे अरुणाचल प्रदेश पर भी मालिकाना हक जताया, लेकिन सैन्य चुनौती नहीं दी। इस क्षेत्र और पूरी दुनिया में सत्ता समीकरण में बदलावों के आधार पर उसके तेवर बदलते रहे।

1986-87 में जब उसने देखा कि राजीव गांधी ने रक्षा बजट को अभूतपूर्व रूप से जीडीपी का 4% कर दिया तो उसने फिर वांगदुंग-सुमदोरोंग चू (अरुणाचल) में हमें आजमाया। उसे फिर करारा जवाब मिला और वह पीछे हट गया। इससे फिर यह सबक मिला कि वह बेवजह गोलियां नहीं चलाएगा, तब तक नहीं जब तक उसे आसानी से जीतने का भरोसा न हो। इससे पता चलता है कि उसकी हरकतों का अनुमान लगा सकते हैं।
आज के संदर्भ में दो हस्तियों से हुई बातचीत प्रासंगिक लगती है।

डॉ. मनमोहन सिंह जब प्रधानमंत्री थे, उन्होंने कहा था कि चीन भारत को हमेशा अस्थिर रखने के लिए पाकिस्तान को मोहरा बना रहा है। हमारा भविष्य इस पर निर्भर है कि हम इस ‘त्रिभुजन’ का तोड़ निकालें। उनका सुझाव यह था कि हम पाकिस्तान से अच्छे रिश्ते बनाने की कोशिश करें।

लेकिन आज पाकिस्तान से दुश्मनी मोदी-भाजपा राजनीति का केंद्रीय तत्व बन गया है। यह पाकिस्तान से ज्यादा चीन से सुलह को तरजीह देगी। वैसे, लक्ष्य त्रिभुजन से बचना ही है। दूसरी बात वाजपेयी के साथ हुई थी, जिन्होंने चीन की वार्ता शैली का खुलासा किया था, ‘देखिए, आप-हम वार्ता कर रहे हैं। दोनों समाधान चाहते हैं। मैं कहूंगा कि थोड़ी रियायत कीजिए, आप मना कर देंगे। मैं कहूंगा, कुछ कम रियायत कर दीजिए, आप फिर मना कर देंगे। अंततः आप मान जाएंगे और उस थोड़े को गंवा देंगे। लेकिन चीन कभी ऐसा नहीं करेगा।’

ये दोनों नेता यही स्पष्ट करते हैं कि चीन अपनी बात पर कायम रहता है और उसका अनुमान लगाया जा सकता है। इसलिए उसने लद्दाख में जो किया है, उसका अनुमान हमें पिछले साल 5 अगस्त को ही लग जाना चाहिए था, जब हमने जम्मू-कश्मीर में भारी बदलाव किए थे। हमें मालूम था कि वहां के भौगोलिक पेंच में एक तीसरा पक्ष चीन भी है।

गृह मंत्री अमित शाह ने संसद में यह बयान देकर कोई भी रास्ता नहीं छोड़ा कि ‘हम अपनी जान की बाज़ी लगाकर भी अक्साई चीन को हासिल करके रहेंगे।’ इसके बाद नए नक्शे आए, ‘सीपीईसी’ (चीन-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर) को भारतीय क्षेत्र से बनाने पर और मौसम की रिपोर्ट पर आपत्तियां आईं। लद्दाख-अक्साई चीन में 1962 के बाद से भौगोलिक दृष्टि से यथास्थिति जैसी बनी हुई थी।


मैं यह नहीं जानता चीनी सेना एलएसी के उस ओर है या इस ओर। मैं सिर्फ इतना कह सकता हूं कि इसका अनुमान 5 अगस्त 2019 को ही लगा लेना चाहिए था और तैयारी भी तभी कर लेनी चाहिए थी। इन 60 वर्षों में जो कुछ हुआ है, उन्हीं की तरह चीनी कदमों को भी अप्रत्याशित नहीं मान सकते। और जहां तक इन कदमों को उठाने का समय चुनने की बात है, तो उसे बस बर्फ के पिघलने का इंतज़ार था।
(ये लेखक के अपने विचार हैं।)



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शेेखर गुप्ता, एडिटर-इन-चीफ, ‘द प्रिन्ट’


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लालच और वैश्वीकरण ने हमें कोविड-19 और दूसरी विपदाओं के लिए जिम्मेदार बना दिया है

हाल के हफ्तों में हमें यह पता चला है कि दुनिया नाजुक है। पिछले 20 सालों में हम लगातार इंसान निर्मित और प्राकृतिक प्रतिरोधों (बफर) व नियमों को लगातार हटाते रहे, जो पर्यावरणीय, भूराजनीतिक या वित्तीय तंत्रों के संकट में पड़ने पर हमारी रक्षा करते थे। तकनीक के भारी इस्तेमाल से हमने ‌वैश्वीकरण को पहले से कहीं तेज, सस्ता व गहरा कर दिया है। कौन जानता था कि चीन के वुहान से अमेरिका के लिए सीधी उड़ानें थीं?

इन बातों को एकसाथ देखें तो आपको ऐसी दुनिया मिलेगी जिसे एेसे झटकों से ज्यादा खतरा है, जिन्हें नेटवर्क्ड कंपनियां और लोग दुनियाभर में फैला सकते हैं। यह कोरोना से और स्पष्ट हो गया है। लेकिन दुनिया को अस्थिर करने वाला यह ट्रेंड पिछले 20 सालों से बन रहा है: 9/11, 2008 की महामंदी, कोरोना और जलवायु परिवर्तन। महामारियां अब सिर्फ जैविक नहीं रह गईं। वे अब भू-राजनैतिक, वित्तीय और वायुमंडलीय हो गई हैं।

इनमें पैटर्न देखिए। मेरे द्वारा उल्लेखित हर संकट के पहले हमें एक ‘हल्का’ झटका मिलता है, जो सावधान करता है कि हमने प्रतिरोध हटा दिया है। हालांकि हर मामले में हमने चेतावनी को गंभीरता से नहीं लिया और संकट ने पूरी दुनिया को घेर लिया। ‘इंडिस्पेंसेबल: व्हेन लीडर्स रियली मैटर’ के लेखक गौतम मुकुंदा कहते हैं, ‘हमने वैश्वीकरण वाले नेटवर्क बना लिए क्योंकि वे हमें ज्यादा दक्ष और उत्पादक बनाकर जिंदगी आसान कर सकते हैं। लेकिन जब आप लगातार प्रतिरोध और स्वयं की अतिरिक्त क्षमता को खत्म करते हैं और कुछ समय की दक्षता पाने या लालच के लिए संरक्षक बढ़ाते जाते हैं, तो आप न सिर्फ तंत्रों को झटके के प्रति कम सहनशील बनाते हैं, बल्कि झटकों को हर ओर फैला देते हैं।’

शुरुआत 9/11 से करते हैं। आप अलकायदा और ओसामा को राजनीतिक रोगाणु की तरह देख सकते हैं। यह रोगाणु कैसेट टेप्स और फिर इंटरनेट के जरिए पाकिस्तान, उत्तर अफ्रीका, यूरोप, भारत और इंडोनेशिया तक फैल गया। पहली चेतावनी 26 फरवरी 1993 को मिली जब वर्ल्ड ट्रेड सेंटर की बिल्डिंग के नीचे एक वैन से धमाका किया गया। इसके बाद जो होता गया, हम सब जानते हैं। अलकायदा का वायरस इराक और अफगानिस्तान से होते हुए रूप बदलता रहा और आईएसआईएस में बदल गया।

फिर 2008 में आई महामंदी। वैश्विक बैंकिंग संकट भी इसी तरह फैला। ‘लॉन्ग टर्म कैपिटल मैनेजमेंट’ नाम के वायरस से इसकी चेतावनी मिली, जो कि 1994 में आया एक हेज फंड था, जिसने बहुत कमाई का लालच दिया। इसे जैसे-तैसे रोका गया। लेकिन हमने कोई सबक नहीं लिया एक दशक बाद आर्थिक महामंदी आ गई। दुर्भाग्य से लालच के लिए कोई हर्ड इम्यूनिटी नहीं है।

कोविड-19 की चेतावनी 2002 में सार्स के रूप में आई थी, पर हम चेते नहीं। सार्स के लिए जिम्मेदार कोरोनावायरस भी चमगादड़ों और पाम सिवेट्स में पाया गया था और इंसानों में इसलिए पहुंचा क्योंकि हम घनी शहरी आबादी पर जोर दे रहे हैं और प्राकृतिक प्रतिरोध खत्म कर रहे हैं।

सार्स चीन से हांगकांग एक प्रोफेसर के जरिए पहुंचा था, जो एक होटल के कमरा नंबर 911 में रुके थे। जी हां 911! बहुत से लोग जलवायु परिवर्तन को गंभीर नहीं मानते हैं। हर मौसम अपनी तीव्रता बढ़ा रहा है। इनसे जुड़े घटनाक्रम लगातार हो रहे हैं और महंगे पड़ रहे हैं। कोविड-19 से अलग हममें वे एंडीबॉडी हैं जो हमें जलवायु परिवर्तन के साथ रहने और उसे कम करने में मदद कर सकती हैं। अगर हम प्राकृतिक प्रतिरोधों को सरंक्षित करें तो भी हमें हर्ड इम्यूनिटी मिल जाएगी।

इन चारों वैश्विक आपदाओं की यात्रा यांत्रिक और अपरिहार्य लग सकती है। लेकिन ऐसा नहीं था। यह केवल विभिन्न विकल्पों, मूल्यों को चुनने के बारे में था, जिन्हें हमारे ‌वैश्वीकरण के युग में अलग-अलग समय पर इंसानों और उनके नेताओं ने चुना या नहीं चुना। तकनीकी रूप से कहें तो वैश्वीकरण निश्चित था। लेकिन हम उसे क्या आकार दें, यह तय नहीं है। वेंचर कैपिटलिस्ट और राजनीतिक अर्थशास्त्री निक हैनेयोर ने मुझसे एक दिन कहा था, ‘रोगाणुओं का आना तय है, लेकिन यह अपरिहार्य नहीं है कि वे महामारियों में बदलें।’

हमने दक्षता के नाम पर प्रतिरोधों को हटाने का फैसला लिया, हमने पूंजीवाद को फैलने दिया और सरकारों की क्षमताएं तब कम कर दीं, जब इनकी सबसे ज्यादा जरूरत थी। हमने महामारी में एक-दूसरे का सहयोग न करने का फैसला लिया, हमने अमेजन के जंगल काटने का फैसला लिया, हमने प्राचीन पारिस्थितिकी तंत्र में घुसपैठ कर वन्यजीवन का शिकार किया।

फेसबुक ने राष्ट्रपति ट्रम्प के भड़काऊ पोस्ट न हटाने का फैसला लिया, जबकि ट्विटर ने ऐसा किया। और बहुत से मुस्लिम धार्मिक नेताओं ने फैसला लिया कि वे भूतकाल को भविष्य को दफनाने देंगे, जबकि होना यह चाहिए कि भविष्य भूतकाल को दफनाए।

जरूरी सबक यह है कि जैसे-जैसे दुनिया आपस में ज्यादा गहराई से गुंथती जा रही है, हर किसी के व्यवहार का महत्व भी बढ़ता जा रहा है। उन मूल्यों का महत्व बढ़ रहा है जिन्हें एक-दूसरे पर निर्भर इस दुनिया में हम लाते हैं। और इसी के साथ ‘गोल्डन रूल’ भी पहले से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण हो गया है। यानी दूसरों के साथ वैसा ही बर्ताव करें, जैसा बर्ताव हम अपने साथ चाहते हैं।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)



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थाॅमस फ्रीडमैन, तीन बार पुलित्ज़र अवॉर्ड विजेता एवं ‘द न्यूयॉर्क टाइम्स’ में नियमित स्तंभकार


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अनलॉक-1.0 के बाद पटरी पर लौटती जिंदगी में अब हमें अपने जीने के तरीकों को बदलना होगा

जब ‘छूना’ वर्जित हो जाए और जीवन के लिए जरूरी ‘सांस’ भी जोखिमभरी हो जाए तो पूरी मानवता ही मुश्किल में आ जाती है। जब तक वायरस को रोक नहीं लिया जाता, ‘कोरोना के साथ जीने’ वाली स्थिति रहेगी। इसके लिए ‘पॉज’ बटन नहीं, ‘रीसेट’ बटन की जरूरत है। मन और जीने के तरीकों को रीसेट करना होगा।

प्यू रिसर्च सेंटर के एक सर्वे में 91% अमेरीकियों ने कहा कि वायरस ने उनके जीवन को बदल दिया है। करीब 77% रेस्त्रां नहीं जाना चाहते और 66% राष्ट्रपति चुनावों में वोट के लिए लाइन में लगने को लेकर सहज नहीं हैं। यह सब एक सूक्ष्म जीवाणु का असर है। जब देश में संक्रमण का आंकड़ा एक लाख के पार हुआ तो आजादी की एक तड़प दिखी।

इसलिए लॉकडाउन 4.0 पहले से पूरी तरह अलग रहा। यह तड़प बताती है कि हम शायद वायरस का सामना करने के लिए तैयार हैं क्योंकि जीवन बहुत लंबे समय तक बंधन में रहने से कहीं ज्यादा है। इस वायरस के फैलने से एक व्यक्ति के स्वास्थ्य के लिए दूसरे पर निर्भरता का जरूरी अंतरसंबंध सामने आया है।

यही अब हमारे रवैये और व्यवहार का आधार होगा। हमें सोशल डिस्टेंसिंग बनाए रखते हुए, एक दूसरे से सार्थक ढंग से जुड़े रहने और हर संभव मदद करने की जरूरत है। कोरोना के बाद क्लासरूम की जगह घरों ने ले ली है, सेमीनार वेबिनार में बदल गए हैं। एक स्वस्थ डिजिटल लाइफ उभर रही है, हालांकि इन साधनों तक सभी की बराबर पहुंच अभी मुद्दा है। नई आदतें कोरोना के साथ जीने के लिए जरूरी हैं।

लोगों की जिंदगियां बचाते हुए अर्थव्यवस्था का पुनरुद्धार इस समय मुख्य चुनौती है। पिछली शताब्दी के महामंदी के बाद अब वैश्विक अर्थव्यव्स्था ऐसी गंभीर गिरावट देख रही है। उत्पादन के केंद्र और अन्य आर्थिक गतिविधियां, इनमें शामिल लोगों की पूरी सुरक्षा के साथ ही शुरू हों।

कम समय में तेजी से पुराने उत्पादन स्तर को पाने की कोशिश की जगह धीरे-धीरे काम की नीति बेहतर होगी। इस वायरस ने स्वास्थ्य इंफ्रास्ट्रक्चर की अपर्याप्तता को सामने लाकर जनस्वास्थ्य पर जरूरी निवेश की आवश्यकता को भी रेखांकित किया है।

वायरस का फैलाव हमारे देश के आपसी सहयोग वाले संघवाद को भी सामने लाया है, जहां केंद्र और राज्य स्तर के नेतृत्व ने एक-दूसरे की बिंदुओं को लॉकडाउन 1.0 से 4.0 तक में समायोजित किया। यही भावना आर्थिक पुनरुद्धार के लिए उठाए जाने वाले कदमों का भी मार्गदर्शन करेगी। ऐसी परिस्थिति का सामना करने में बेहतर नतीजों के लिए शासन के तीसरे स्तर और स्थानीय समुदायों को भी और सशक्त करने की जरूरत है।
इतिहासकार और लेखक युवाल नोआ हरारी ने दुख जताया है कि कोविड-19 को लेकर वैश्विक प्रतिक्रिया आदर्श नहीं रही है। हर देश वायरस के खिलाफ अपनी खुद की लड़ाई लड़ रहा है, जबकि जरूरत सामूहिक वैश्विक प्रतिक्रिया की थी। इससे वे देश प्रभावित हो रहे हैं, जहां संसाधन कम हैं।

वायरस के विस्फोट की वजह से तकनीक तक पहुंच, आय के स्तर और जीविका से जुड़ी असुरक्षा आदि से संबंधित मौजूदा असमानताओं पर भी ध्यान गया है। कुल मिलाकर कोरोना वायरस हमारे लिए ‘शॉक ट्रीटमेंट’ की तरह है। यह हमें सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक और वैश्विक दृष्टिकोणों को रीसेट करने के अलावा एक-दूसरे और प्रकृति संग एकता से रहने की भी याद दिला रहा है।



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एम. वैंकैया नायडू, उपराष्ट्रपति


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वापसी के बाद खिलाड़ियों के ट्रेनिंग शेड्यूल में बड़े बदलाव होंगे, सोशल डिस्टेंसिंग के बीच प्रैक्टिस करनी होगी 

कोरोना वायरस के चलते टोक्यो ओलिंपिक एक साल के लिए टल गया है। कई खेलों के बड़े टूर्नामेंट भी स्थगित हो चुके हैं। देश में स्टेडियम और स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स तो खुल गए हैं। लेकिन, खेल गतिविधियां बड़े स्तर पर शुरू नहीं हुई हैं। खिलाड़ियों के लिए यह दौर संकट से कम नहीं है, क्योंकि उन्हें रिदम में लौटने के लिए नए सिरे से तैयारी करनी होगी।

इसके लिए अलग-अलग खेलों के विशेषज्ञों ने खिलाड़ियों की वापसी के लिए स्पेसिफिक ट्रेनिंग प्लान बनाया है, जिसमें फिजिकल ट्रेनिंग के साथ-साथ मेंटल सपोर्ट भी शामिल है। ट्रेनिंग शेड्यूल में सोशल डिस्टेंसिंग और सैनिटाइजेशन को भी शामिल किया गया है। क्रिकेट, एथलेटिक्स, बॉक्सिंग, टेनिस, रेसलिंग, वेटलिफ्टिंग, बैडमिंटन, फुटबॉल और हॉकी के विशेषज्ञों ने बताया कि खिलाड़ियों का शेड्यूल कैसा होगा।

क्रिकेट: ट्रेनिंग के पहले जजमेंट करेंगे, फिर मोटर स्किल्स पर काम करेंगे
काफी दिन तक प्रैक्टिस नहीं करने से क्रिकेटरों के प्रदर्शन और उसके स्तरमें गिरावट आई है। उसे पहले जैसा बनाने के लिए अलग-अलग पार्ट में मेंटल सपोर्ट के साथ फिटनेस ट्रेनिंग देंगे। ऐसा नहीं करने पर खिलाड़ी के मेंटल ब्रेकडाउन होने का खतरा रहता है। ट्रेनिंग के पहले जजमेंट करेंगे और फिर मोटर स्किल्स (स्पीड, स्ट्रेंथ, एंड्यूरेंस) पर काम करेंगे। मसल मेमोरी डेवलप कर खिलाड़ी की गेंद के साथ कनेक्टिविटी बढ़ाएंगे।
-डॉ. पल्लब दास गुप्ता, हाईपरफॉर्मेंस मैनेजर, साई कोलकाता के क्रिकेट कोच

टेनिस: टेक्निकल और टेक्टिकल लेवल सुधारने पर काम करेंगे
टेनिस ओपन स्पोर्ट्स है। यहां खिलाड़ियों के बीच वैसे भी दूरी रहती ही है। खिलाड़ियों ने पिछले दो माह में रेस्ट के साथ फिजिकल और मेंटल लेवल पर बहुत काम किया है। अब हम उनका टेक्निकल और टेक्टिकल लेवल सुधारने पर काम करेंगे। आने वाले टूर्नामेंट को देखते हुए प्री-कॉम्प्टिीशन फेज, पोस्ट कॉम्प्टिीशन फेज, एक्टिव रेस्ट और पेसिव रेस्ट फेज से ट्रेनिंग देंगे। इससे खिलाड़ी दो हफ्ते में रिदम में आ जाएगा।
- साजिद लोधी, पूर्व कोच, नेशनल जूनियर टेनिस टीम

रेसलिंग: टेक्नीक की ट्रेनिंग अलग-अलग कैटेगरी में बांटकर दी जाएगी
पहलवानों को मेट पर बुल्गारियन और इंडियन डमी के साथ ऑन द मैच तकनीककी प्रैक्टिस कराएंगे। इससे खिलाड़ी बिना कनेक्टिविटी के हिप थ्रो, फ्रंट साल्तो, भारंदाज और वार्मअप थ्रो के साथ प्रैक्टिस पूरी कर फार्म में लौट सके। कोविड-19 के कारण दो माह के लंबे रेस्ट पीरियड में रेसलर फिजिकली रूप से बहुत स्ट्रांग हैं। इसलिए इस पर ज्यादा फोकस करने की जरूरत नहीं है। टेक्नीक की ट्रेनिंग अलग-अलग कैटेगरी में ही बांटकर दी जाएगी।
- प्रदीप शर्मा, कोच, सीनियर नेशनल महिला कुश्ती टीम

बैडमिंटन: स्टेंडिंग स्ट्रोक और मूमेंट ट्रेनिंग से कॉन्फिडेंस वापस लौटेगा
खिलाड़ियों के स्टेंडिंग स्ट्रोक के लिए छोटे-छोटे प्रैक्टिस सेशन बनाए हैं, जिसमें वे कोर्ट पर स्मैश, ड्रॉप शॉट, फोरहैंड और बैक हैंड के साथ कई पोजीशन पर काम करेंगे। ऐसा करने से उनका कॉन्फिडेंस लेवल तो बढ़ेगा ही। साथ ही साथ वे कम समय में मूमेंट ट्रेनिंग भी पूरी कर सकेंगे। पुरानी पोजीशन में लौटने में खिलाड़ियों को एक-दो हफ्ते लगेंगे।
- संजय मिश्रा, भारतीय जूनियर बैडमिंटन टीम के कोच

हॉकी: बेसिक ट्रेनिंग से शुरुआत करेंगे, ताकि स्टिक पर होल्ड आ जाए
लॉकडाउन में आराम के बाद खिलाड़ियों को लय में लाने के लिए स्टॉपिंग, हिटिंग, पुशिंग, रिसीविंग, शूटिंग, पासिंग टाइमिंग और पासिंग एक्यूरेसी जैसी बेसिक ट्रेनिंग से शुरुआत की जाएगी। इसके अलावा आसान स्किल्स के जरिए खिलाड़ियों को प्रैक्टिस मोड में लाया जाएगा, जिससे उसका स्टिक पर होल्ड आ जाए। एकाएक लोड देने पर खिलाड़ी चोटिल हो सकता है।
-शिवेंद्र सिंह चौधरी, कोच हॉकी इंडिया और पूर्व ओलिंपियन

एथलेटिक्स: चेनिंग और शेपिंग मैथड से प्रदर्शन सुधारेंगे
खिलाड़ियों को टीचिंग प्रोगेशन के साथ चेनिंग और शेपिंग मैथड पर काम करना होगा। एंड्यूरेंस स्पोर्ट्स (लॉन्ग डिस्टेंस इवेंट), फील्ड इवेंट (जंपिंग-थ्रो) और स्प्रिंट इवेंट (शॉर्ट डिस्टेंस इवेंट और हर्डल्स) के एथलीट शुरुआती स्टेज में इंटेंसिटी मेंटेन कर तैयारी करेंगे। इसके बाद ही उनका आत्मविश्वास और कॉर्डिनेशन बढ़ेगा। ट्रेनिंग का यह पार्ट सभी के लिए अलग-अलग होगा।
- प्रो. जेपी भूकर, लेवल-2 कोच, वर्ल्ड एथलेटिक्स

बॉक्सिंग: तीन फेज की पीक ट्रेनिंग शुरू की जाएगी
बॉक्सर ने लॉकडाउन के बीच भी घर पर रहकर फिजिकल फिटनेस पर काम किया है। वह रिंग से दूर रहा है। लेकिन, इसका फिटनेस पर असर सिर्फ 5 या 10 प्रतिशत ही आया हाेगा। टूर्नामेंट शेड्यूल आते ही तीन फेज की पीक ट्रेनिंग शुरू हो जाएगी। इसमें विरोधी को ध्यान में रखकर फिटनेस के साथ स्किल और गेम इम्प्रूवमेंट करने पर काम किया जाता है। तीसरे और अंतिम फेज में बॉक्सर फुल पीक पर रहता है, जिसमें उसे खेलना होता है।
- महावीर सिंह, द्रोणाचार्य अवार्डी और नेशनल महिला बॉक्सिंग टीम के कोच

फुटबॉल: खिलाड़ी की ट्रेनिंग की मॉनिटरिंग की जाएगी
खिलाड़ी ने लॉकडाउन में कैसी ट्रेनिंग की है, इसे देखने के बाद ही उसकी नए सिरे से ट्रेनिंग शुरू होगी। पावर ट्रेनिंग, फिजिकल डेवलपमेंट टेक्नीक और गेंद के साथ फिजिकल ट्रेनिंग कर खिलाड़ी को वापस रिदम में लाने की कोशिश की जाएगी। ट्रेनिंग की मॉनिटरिंग भी की जाएगी, ताकि पता चल सके कि किस खिलाड़ी को कब और कैसी ट्रेनिंग करनी है। इसके बाद ही खिलाड़ी मैदान पर गेंद से तालमेल बिठा सकेगा।
- डॉ. प्रदीप दत्ता, फीफा इंस्ट्रक्टर

वेटलिफ्टिंग: हर खिलाड़ी के लिए बनेगा पीरियोडाइसेशन प्रोग्राम
खिलाड़ी का लॉकडाउन से पहले और अभी फिटनेस लेवल क्या है, इसका वैल्यूएशन होगा। इसके बाद उसका लेवल किस-किस कैटेगरी में नीचे गया, उस पर फोकस कर काम किया जाएगा। इसके लिए पीरियोडाइसेशन प्रोग्राम की मदद ली जाएगी। वैसे वेटलिफ्टिंग इंडिविजुअल स्पोर्ट्स है, जिसमें खिलाड़ी को अकेले ही ट्रेनिंग पूरी करनी होती है। अन्य खेलों की तुलना में उस पर ज्यादा इफेक्ट नहीं पड़ा।
- प्रो. विल्फ्रेड वाज, डायरेक्टर ऑफ फिटनेस सेंटर, एलएनआईपीई



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खिलाड़ियों के लिए यह दौर संकट से कम नहीं है, क्योंकि उन्हें रिदम में लौटने के लिए नए सिरे से तैयारी करनी होगी। -प्रतीकात्मक फोटो


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झारखंड के कटहल को लंदन और भिंडी को दुबई भेजने की तैयारी; किसानों की आय तिगुनी होगी, रांची की सब्जियों से होगी शुरुआत

लॉकडाउन की वजह से नुकसान उठाने वाले किसान अपनी सब्जी को विदेश भेज सकेंगे। झारखंड में उपजी सब्जियां कटहल, भिंडी, करेला, गोभी, कद्दू आदिकोसिंगापुर, कतर, सऊदी अरब, लंदन सहित कई यूरोपीय देशों में निर्यात करने की तैयारी है। इससे सब्जी उत्पादक किसानों की आय 3 गुना तक बढ़ जाएगी।

पिछले साल राज्य से भिंडी, बीन्स थोड़ी मात्रा में दुबई व कतर में निर्यात की गई है। गुणवत्ता की वजह से यहां के सब्जियों की मांग ज्यादा है। यहां की सब्जियों की तारीफ कृषि और प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण (एपीडा) की वार्षिक रिपोर्ट में भी की गई है। कृषि बाजार समिति ने पूरी तैयारी कर ली है। दो तीन महीनों में निर्यात शुरू हो जाएगा।

सब्जियों को दूसरे देशों में भेजने के लिए भारत सरकार के वाणिज्य व उद्योग मंत्रालय के अंतर्गत आने वाले प्राधिकरण एपीडा ने भी प्रयास शुरू कर दिए हैं। इसके लिए एक्सपोर्टर कंपनी ऑल सीजन फॉर्म फ्रेश का सहयोग लिया जा रहा है।

समिति के पणन सचिव अभिषेक आनंद ने बताया कि झारखंड में सब्जियों को उगाने का ईको सिस्टम अच्छा होने और फर्टिलाइजर का उपयोग नहीं किए जाने से ये उच्च गुणवत्ता की होती हैं। शुरुआत में रांची व आसपास के क्षेत्रों की सब्जियां एक्सपोर्ट की जाएंगी।

झारखंड में विभिन्न सब्जियों का 40 लाख मीट्रिक टन उत्पादन

1. झारखंड के ड्रम स्टिक (सहजन की फली) और कटहल को पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, बिहार, दिल्ली में काफी पसंद किया जाता है।
2. झारखंडमें विभिन्न सब्जियों का करीब 40 लाख मीट्रिक टन उत्पादन प्रति वर्ष होता है। झारखंड में सब्जियों की उत्पादकता 14.8 एमटी प्रति हेक्टेयर है।
3. राज्य में आलू, मटर, टमाटर, बैंगन, गोभी, बीन्स, भिंडी, कद्दू, करैला, ब्रोकली, हरी मिर्च, कटहल, ड्रम स्टिक, गिलकी सहित अन्य सब्जियों का भरपूर उत्पादन होता है।

कटहल व गोभी पिछले वर्ष दूसरे राज्य भेजे गए

पिछले साल पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, मुंबई, ओडिशा, हैदराबाद, छत्तीसगढ़ व बिहार में फ्रेंच बीन्स 1250 टन, मटर की फली 1200 टन, फूल गोभी 1800 टन, बंद गोभी 480 टन, शिमला मिर्च 800 टन, हरी मिर्च 600 टन, बैंगन 500 टन, कटहल 2100 टन, कद्दू 1080 टन, खीरा 600 टन व मूली 500 टन के अलावा टमाटर और अन्य सब्जियां भी भेजी गईं।
नोट: ये झारखंड की कृषि बाजार समिति के अनुमानित आंकड़े हैं।



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पिछले साल राज्य से भिंडी, बीन्स थोड़ी मात्रा में दुबई व कतर में निर्यात की गई है। गुणवत्ता की वजह से यहां के सब्जियों की मांग ज्यादा है।


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टेलीकॉम कंपनियां 1 जीबी डेटा 4 से बढ़ाकर 35 रुपए तक, नए सिम 75 रुपए में बेचना चाहती हैं, फ्री एप को भी बंद करने की तैयारी

दिसंबर 2019 में 30% तक कीमत बढ़ाने वाली टेलीकॉम कंपनियां फिर से डेटा की कीमत में इजाफा करना चाहती हैं। टेलीकॉम कंपनियों के संगठन सीओएआई का दावा है कि अभी कंपनियों को घाटा हो रहा है। आईसीआईसीआई सिक्योरिटीज की रिपोर्ट के मुताबिक, कंपनियां चाहती हैं कि अभी एक जीबी डेटा के अधिकतम 4 रुपए लगते हैं उसकी कीमत 35 रुपए तक हो। यानी करीब 775% अधिक।

इतना ही नहीं, रिपोर्ट में हर सुविधा का एक निश्चित न्यूनतम रेट (फ्लोर प्राइस) फिक्स करने और बढ़ाने को कहा गया है। नई सिम खरीदने पर सबस्क्रिप्शन चार्ज, न्यूनतम फिक्स वॉयस कॉल चार्ज, फ्री एप की सुविधा बंद करने जैसी मांग भी रखी गई है।

टेलीकॉम कंपनियां चाहती है कि कीमत को ट्राई बढ़ाए, जिससे उनके बीच आपसी प्रतिस्पर्धा से नुकसान न हो। हालांकि, कोरोना के कारण इस पर ट्राई ने कोई मीटिंग नहीं की है।

फ्लोर प्राइस से सुनिश्चित होगा कि ये सेक्टर कितना टिकेगाः सीओएआई

सेलुलर ऑपरेटर एसोसिएशन ऑफ इंडिया (सीओएआई) के डायरेक्टर जनरल राजन एस मैथ्यूज का कहना है कि टेलीकॉम सेक्टर के ऊपर सबसे ज्यादा वित्तीय दबाब है। ये तथ्य है कि भारतीय टेलीकॉम सर्विस का एवरेज रेवेन्यू प्रति यूजर (एआरपीयू) और टेरिफ दुनिया में सबसे सस्ता है। फ्लोर प्राइस से सुनिश्चित होगा कि ये सेक्टर कितना टिकेगा।

हम इस स्थिति में आ पाएं कि स्पेक्ट्रम और एडजेस्टेड ग्रॉस रेवेन्यू(एजीआर) की उधारी चुका पाएं। टेलीकॉम इंडस्ट्री चाहती है कि इन सभी मुद्दों पर जल्द निर्णय हो।

टेलीकॉम ऑपरेटर्स को रेट बढ़ाने के लिएअनुमति की जरूरत नहींः ट्राई

रिपोर्ट के अनुसार, रिलायंस जियो 20 रुपए, भारती एयरटेल 30 रुपए एवं वोडाफोन आइडिया लिमिटेड एक जीबी डेटा का 35 रुपए न्यूनतम मूल्य करना चाहती हैं। अभी प्रति जीबी डेटा का अधिकतम चार्ज 4 रुपए है। भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण (ट्राई) के सचिव सुनील के गुप्ता ने भास्कर से कहा कि टेलीकॉम ऑपरेटर्स को रेट बढ़ाने के लिए किसी तरह की अनुमति की जरूरत नहीं है।

ये अलग बात है कि वो रेट बढ़ाते हैं, तो उन्हें स्पर्धा का सामना करना पड़ता है। जहां तक मुझे याद है कि सीओएआई का चर्चा के लिए एक पत्र आया था। अभी कई जरूरी काम हैं। समय निश्चित करके उनसे बात की जाएगी। ये तो सोचने की बात है कि तीनों टेलीकॉम कंपनी कहें कि उन्हें घाटा हो रहा है, फिर भी वो घाटा उठाती रहें तो ये समझ से परे है। क्या लंबे समय तक कोई घाटा उठा सकता है? हमें तथ्यों को देखना चाहिए।

  • एयरटेल, वोडाफोन आइडिया का प्रस्ताव है कि सब्स्क्रिप्शन फीस 40-75 रु. के बीच में होना चाहिए। अनलिमिटेड वॉयस कॉल चार्ज 60 रु. प्रतिमाह होना चाहिए। जियो के अनुसार, वॉयस कॉल का न्यूनतम शुल्क यूनिट बेसिस पर हो। ये कम से कम 6 पैसे प्रति मिनट होना चाहिए।
  • फ्लोर प्राइस को एयरटेल दो साल और रिलायंस जियो 3 साल के लिए लागू करने के बाद समीक्षा की बात कह रहे हैं। वहीं आइडिया सालाना समीक्षा चाहती है।
  • जियो ने प्रस्ताव दिया है कि अतिरिक्त सेवाओं का चार्ज लिया जाए, जो कम से कम उसके वास्तविक मूल्य के बराबर हो। इनमें वीडियो ऑन डिमांड एवं अन्य एप भी शामिल हैं, जिन पर मुफ्त का ऑफर है।
  • एयरटेल और वोडाफोन का कहना है कि टैरिफ ऐसे हों कि कम से कम 15% आरओसीई (नियोजित पूंजी पर वापसी) निकल सके। सभी ऑपरेटर्स ने कॉस्ट बेस्ड केल्कुलेशन को पुरातन बताते हुए खारिज कर दिया।
  • बीएसएनएल भी नियमानुसार न्यूनतम दर पर सहमत है। कंपनियों की योजना है कि अगर ट्राई दाम बढ़ाने पर निर्णय नहीं लेती हैं तो वे पैक की वैलिडिटी कम कर सकते हैं।

फायदा: इससे स्पीड और बेहतर होगी
अभी तक कंपनियां आपसी स्पर्धा के कारण एकतरफा टैरिफ नहीं बढ़ा पा रही हैं। प्रस्तावित फ्लोर प्राइस 5 गुना बढ़ा दी जाती है तो सर्विस में भी सुधार होगा, क्योंकि लोग आवश्यकता अनुसार डेटा का इस्तेमाल करेंगे, जिससे बेहतर डेटा स्पीड मिलेगी।

  • रिपोर्ट में बताए गए फ्लोर प्राइस के अनुसार, यह बढ़ाेतरी टेलीकॉम कंपनियों के लिए गेमचेंजर होगी। इससे ये अपने स्ट्रक्चर को नए सिरे से बना सकती हैं। फ्लोर प्राइस में तय दर से नीचे कोई भी कंपनी सस्ता प्लान नहीं दे सकती है।


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रिपोर्ट में टेलीकॉम कंपनियों द्वारा हर सुविधा का एक निश्चित न्यूनतम रेट (फ्लोर प्राइस) फिक्स करने और बढ़ाने को कहा गया है। -प्रतीकात्मक फोटो


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काेराेना मरीजों को रेमडेसिविर दवा देने की इजाजत, कीमत अभी तय नहीं, कंपनी ही यह निर्णय लेगी

भारत में कोरोना मरीजों के इलाज के लिए अमेरिकी कंपनी गिलियाड की दवा रेमडेसिविर के इस्तेमाल की इजाजत दे दी गई है। कंपनी इसे भारत में बना और बेच सकेगी। हालांकि, अभी आपातकालीन इस्तेमाल के तहत सिर्फ अस्पतालों में भर्ती मरीजों काे ही यह दवा दी जाएगी। दवा की कीमत अभी तय नहीं है।

पेटेंटेड हाेने के कारण कंपनी ही इसकी कीमत तय करेगी। भारत से पहले अमेरिका और जापान भी काेराेना मरीजाें पर इसके आपातकालीन इस्तेमाल की इजाजत दे चुके हैं।

रेमडेसिविर इंजेक्शन को भारत में इस्तेमाल करने की मंजूरी दीः सूत्र

स्वास्थ्य मंत्रालय के सूत्रों के मुताबिक, सोमवार को सेंट्रल ड्रग्स स्टैंडर्ड कंट्रोल ऑर्गेनाइजेशन (सीडीएससीओ) ने काेराेना मरीजों के इलाज के लिए रेमडेसिविर इंजेक्शन को भारत में इस्तेमाल करने की मंजूरी दी। सीडीएससीओ की एक्सपर्ट कमेटी ने पिछले सप्ताह ही इस दवा काे इस्तेमाल के पहले क्लीनिकल ट्रायल से छूट दी थी।

गिलियाड ने भारत की दो दवा कंपनियों सिपला और हिटेरो से दवा के यहां निर्माण का समझौता किया है। दोनों कंपनियों ने भी सीडीएससीओ से दवा बनाने और बेचने की इजाजत मांगी है।देश में अभी कोरोना मरीजों को हाइड्राेक्सीक्लाेराेक्वीन और एजिथ्रोमाइसिन का काॅम्बिनेशन दिया जा रहा है।

यही दवा ठीक है या काॅम्बिनेशन में बदलाव की जरूरतः नीति आयोग

नीति आयोग के सदस्य सह कोविड टास्क फोर्स के चेयरमैन डॉ. वीके पॉल की अध्यक्षता वाली टीम रिव्यू कर रही है कि यही दवा ठीक है या काॅम्बिनेशन में बदलाव की जरूरत है।

ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी की वैक्सीन का बच्चों पर भी ट्रायल हाेगा
ऑक्सफाेर्ड यूनिवर्सिटी में तैयार की जा रही काेराेनावायरस की वैक्सीन का इस महीने बच्चाें पर भी ट्रायल किया जाएगा। वयस्काें पर हुए ट्रायल में छिटपुट साइड इफेक्ट ही दिखे थे। अब जून में शुरू हाेने वाले एडवांस्ड स्टेज के ट्रायल में 10,260 लाेगाें काे यह वैक्सीन लगाई जाएगी। इनमें से कई 5 से 12 साल तक की उम्र के बच्चे भी हैं।

ऑक्सफाेर्ड काेविड-19 वैक्सीन के लिए प्रवक्ता ने कहा कि आने वाले हफ्ताें में बच्चाें पर दवा के असर के बारे में अलग से जानकारी दी जाएगी। बच्चाें काे ट्रायल में शामिल करना इसलिए भी अहम माना जा रहा है क्याेंकि कई देशाें में स्कूल खुल चुके हैं और भारत सहित कई देश आने वाले कुछ दिनाें में स्कूल खाेलने की तैयारियाें पर विचार कर रहे हैं।



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अभी आपातकालीन इस्तेमाल के तहत सिर्फ अस्पतालों में भर्ती मरीजों काे ही यह दवा दी जाएगी। दवा की कीमत अभी तय नहीं है। - प्रतीकात्मक फोटो


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ऑस्ट्रेलियाः हर गरीब को 7.5 लाख रुपए दे रही सरकार, लेकिन इनकी फर्जी पहचान बताकर पैसा चुरा रहे ऑनलाइन धोखेबाज

ऑस्ट्रेलिया के पर्थ में रहने वाली एंगेली बैसेट पति के साथ बैंक पहुंचीं, तो पता चला कि उनके खाते से 15 लाख रुपए निकालने की कोशिश की गई है। बैंक ने बताया कि उनकी पहचान और दस्तावेज वेरिफाई किए गए थे। इससे वे और उनके पति हैरान रह गए और बताया कि उन्होंने ये नहीं किया है।

इस पर पेमेंट तुरंत रोक दिया गया और वे धोखाधड़ी का शिकार होने से बच गए। लेकिन, ऑस्ट्रेलिया में एंगेली जैसे हजारों लोग हैं, जो इस फ्रॉड का शिकार हो रहे हैं। एंगेली के मुताबिक, उन्हें लगता है कि सरकार को और ज्यादा सावधान और सख्त होने की जरूरत है, क्योंकि यह पैसा हमारे बजाय सरकार का ही है।

सरकार ने गरीबों की मदद के लिए लॉन्च की योजना

दरअसल, सरकार ने कोरोना संकट के दौरान कमजोर हुई लोगों की आर्थिक स्थिति सुधारने के लिए उन्हें मदद देने की योजना लॉन्च की है। पैसा जल्द पहुंचे इसके लिए इसे फास्ट रिलीज सुपर एन्युएशन स्कीम शुरू की है। इसके तहत हर गरीब या जरूरतमंद को करीब 7.5 लाख रुपए दिए जा रहे हैं।

अपराधियों नेसरकारी वेबसाइट से मिलती-जुलती साइट्स बना ली

अपराधियों की नजर इन्हीं पैसों पर है, जिसके लिए वे नए-नए तरीके आजमा रहे हैं। इसकी खामियों का फायदा उठाकर वे करोड़ों रुपए उड़ा चुके हैं। उन्होंने सरकारी वेबसाइट से मिलती-जुलती साइट्स बना ली है, जिन पर लोग अपनी डिटेल्स शेयर करते हैं।

वे इन डिटेल्स का दुरुपयोग कर फर्जी पहचान पत्र, दस्तावेज बना लेेते हैं और पैसों के लिए आवेदन कर देते हैं। अकेले पर्थ में ये धोखेबाज करीब 150 लोगों को धोखा दे चुके हैं और हफ्ते भर में करीब 11.50 करोड़ रुपए चुरा चुके हैं।

सरकार का दावाःशिकायतों के बाद सुरक्षा कड़ी कर दी गई

हालांकि, सरकार का दावा है कि शिकायतों के बाद सुरक्षा कड़ी कर दी गई है। वेबसाइट पर दर्ज हो रहे खातों की संख्या सीमित कर दी गई है। लोगों के दस्तावेज कैसे चोरी हो रहे हैं इस पर गृह मंत्री पीटर डटन का कहना है कि हो सकता है कि टैक्स रिटर्न भरने के दौरान टैक्स एजेंसियों से ये जानकारी लीक या चोरी हुई हो।

पता चलने पर दो दिन स्कीम बंद की, पर चोरी जारी

एक टैक्स अधिकारी को शक होने के बाद धोखेबाजी पकड़ में आई। दरअसल, अपराधी सरकारी वेबसाइट से मिलती-जुलती वेबसाइट बनाकर लोगों की जानकारी चुरा रहे हैं। बाद में उसका इस्तेमाल कर खाते से पैसे निकाल लेते हैं। सरकार ने दो दिन वेबसाइट बंद की फिर सुरक्षा बढ़ाने और सख्त कदम उठाने का दावा किया, लेकिन धोखाधड़ी रुक नहीं रही।



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अपराधी सरकारी वेबसाइट से मिलती-जुलती वेबसाइट बनाकर लोगों की जानकारी चुरा रहे हैं। -प्रतीकात्मक फोटो


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